आधे MP में सूखे जैसे हालात, गेहूं-सोयाबीन की पैदावार घटेगी; 5 साल में सबसे कम बारिश
बारिश के आंकड़ों में प्रदेश के पश्चिमी और पूर्वी हिस्सों के बीच अंतर देखने को मिला। इंदौर, उज्जैन, नर्मदापुरम और ग्वालियर-चंबल संभाग के कई क्षेत्रों में बारिश सामान्य से कम रही। पश्चिमी हिस्से में करीब 12% तक की कमी दर्ज की गई।
MP News: मध्य प्रदेश में मानसून की विदाई के साथ ही बारिश के आंकड़ों ने चिंता बढ़ा दी है। प्रदेश के लगभग आधे हिस्से में सूखे के हालात बन गए हैं। 55 में से 30 जिलों में सामान्य बारिश का लक्ष्य पूरा नहीं हो सका। इनमें 11 जिले ऐसे हैं, जहां सामान्य से 20% से भी ज्यादा कम बारिश हुई। आलीराजपुर में स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक रही। यहां सामान्य बारिश का आधा हिस्सा भी पूरा नहीं हुआ।
सामान्य से 4 प्रतिशत कम बारिश हुई
प्रदेश में इस बार 30 सितंबर तक औसतन 35.6 इंच बारिश दर्ज की गई, जबकि सामान्य औसत 37.3 इंच है। यानी कुल बारिश सामान्य से करीब 4% कम रही। मौसम विभाग के अनुसार, सामान्य बारिश की सीमा 96 से 104% के बीच होती है। इस लिहाज से मध्य प्रदेश में इस बार सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई।
पश्चिमी मध्य प्रदेश में बारिश की ज्यादा कमी
बारिश के आंकड़ों में प्रदेश के पश्चिमी और पूर्वी हिस्सों के बीच अंतर देखने को मिला। इंदौर, उज्जैन, नर्मदापुरम और ग्वालियर-चंबल संभाग के कई क्षेत्रों में बारिश सामान्य से कम रही। पश्चिमी हिस्से में करीब 12% तक की कमी दर्ज की गई। दूसरी ओर, जबलपुर, रीवा, सागर और शहडोल संभाग के पूर्वी हिस्सों में सामान्य से करीब 4% ज्यादा बारिश हुई।
इस असमान बारिश का असर अलग-अलग जिलों में अलग तरह से पड़ सकता है। जिन इलाकों में पर्याप्त बारिश नहीं हुई, वहां खेतों में नमी, जलाशयों में पानी और भूजल की उपलब्धता पर दबाव बढ़ने की आशंका है।
पांच साल में सबसे कम बारिश का आंकड़ा
इस साल की बारिश पिछले कुछ वर्षों के मुकाबले भी कम रही। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 2022 में करीब 46 इंच, 2023 में 37.2 इंच, 2024 में 40.2 इंच और 2025 में 45.2 इंच बारिश हुई थी। इस बार करीब 35.8 इंच बारिश दर्ज की गई। इस तरह पांच साल में यह सबसे कम बारिश का आंकड़ा है।
जून में कम बारिश ने पूरे सीजन के औसत को प्रभावित किया। बाद के महीनों में अच्छी बारिश होने के बावजूद शुरुआती कमी पूरी नहीं हो सकी। सितंबर के अंतिम दिनों में हुई बारिश से कुछ जिलों की स्थिति में सुधार जरूर हुआ, लेकिन प्रदेश का कुल आंकड़ा सामान्य स्तर तक नहीं पहुंचा। सितंबर के अलग-अलग दिनों के आंकड़ों में जिलों की संख्या और बारिश के प्रतिशत में अंतर है। इसलिए पूरे सीजन के 30 सितंबर तक के आंकड़ों को ही अंतिम स्थिति के लिए आधार माना गया है।
बारिश के लंबे दौर की कमी से बढ़ी चिंता
मौसम विशेषज्ञ शैलेंद्र कुमार नायक के मुताबिक, इस बार बारिश का तरीका पिछले वर्षों से अलग रहा। कई इलाकों में एक साथ तेज बारिश हुई, जबकि दूसरे क्षेत्रों में लंबे समय तक बारिश नहीं हुई। लगातार 8 से 10 दिन बारिश होने के बजाय इस बार अधिकतर दो दिन तक ही लगातार बारिश देखने को मिली।
बंगाल की खाड़ी से बनने वाले कम दबाव के क्षेत्र और अन्य मौसमी सिस्टम इस बार कई मौकों पर ज्यादा मजबूत नहीं रहे। बारिश के बीच लंबे अंतराल के कारण खेतों की ऊपरी मिट्टी सूखती रही। इसका असर जमीन में पानी पहुंचने और भूजल स्तर पर पड़ सकता है।
खेती, पेयजल और सिंचाई पर क्या होगा असर?
कम और अनियमित बारिश का असर खेती पर पड़ने की आशंका है। जिन इलाकों में पर्याप्त पानी नहीं गिरा, वहां मिट्टी में नमी की कमी से रबी की बुवाई और फसलों की शुरुआती बढ़त प्रभावित हो सकती है। हालांकि, इसका वास्तविक असर फसलों के प्रकार, सिंचाई की सुविधा और स्थानीय जल उपलब्धता पर निर्भर करेगा।
जलस्रोतों की स्थिति पर रहेगी नजर
पेयजल को लेकर भी कम बारिश वाले जिलों में चिंता बढ़ सकती है। खासकर उन क्षेत्रों में जहां लोग कुओं, बोरवेल और छोटे जलस्रोतों पर निर्भर हैं। बारिश की कमी का असर जलाशयों और सिंचाई व्यवस्था पर भी पड़ सकता है। लेकिन प्रदेश के सभी बांधों और जलाशयों में पानी की स्थिति एक जैसी नहीं है। इसलिए केवल बारिश के आंकड़ों से पानी की कमी का अंतिम निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा।
बारिश के आंकड़े बताते हैं कि इस बार मध्य प्रदेश में पानी का वितरण एक समान नहीं रहा। ऐसे में आने वाले महीनों में जलस्रोतों की स्थिति, फसलों की बुवाई और सिंचाई की जरूरत पर नजर रखना जरूरी होगा।


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