ज्योतिरादित्य सिंधिया हर साल क्यों करते हैं बाबा मंसूर शाह की पूजा? 'आधी रोटी' से जुड़ा क्या रहस्य है
मान्यता के अनुसार 1761 के पानीपत युद्ध में महादजी सिंधिया घायल हो गए थे। परिवार को उनकी सलामती की चिंता थी। इसी दौरान उनकी मां और पत्नी बाबा मंसूर शाह के पास पहुंचीं।
Jyotiraditya Scindia: केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया मंगलवार को ग्वालियर के महाराज बाड़ा स्थित गोरखी देवघर पहुंचे। यहां उन्होंने सूफी संत बाबा मंसूर शाह के सालाना उर्स के मौके पर परिवार की पुरानी परंपरा के अनुसार पूजा-अर्चना की। सिंधिया परिवार के मुखिया के रूप में इस रस्म को निभाने की परंपरा करीब 300 साल पुरानी बताई जाती है। इस बार भी पूजा करीब एक घंटे तक चली और एक फूल चादर पर गिरने के बाद इसे पूरा किया गया।
बाबा मंसूर शाह से जुड़ी यह परंपरा ग्वालियर की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का एक खास हिस्सा मानी जाती है। गोरखी के देवघर में सिंधिया परिवार से जुड़ी कई धार्मिक स्मृतियों के साथ बाबा मंसूर शाह की याद से जुड़ी वस्तुएं भी रखी गई हैं। खास बात यह है कि यहां होने वाली रस्म में हिंदू और मुस्लिम परंपराओं से जुड़े तौर-तरीकों का मेल दिखाई देता है।
फूल गिरने के बाद पूरी हुई पूजा
इस साल की पूजा में ज्योतिरादित्य सिंधिया करीब एक घंटे तक देवघर में बैठे रहे। परंपरा के अनुसार फूलों से शिवलिंग का प्रतीक तैयार किया गया था। इसके सामने चादर बिछाई गई। परिवार से जुड़ी जानकारी के मुताबिक पूजा की अवधि पहले से तय नहीं होती। जब शिवलिंग से एक फूल नीचे चादर पर गिरता है, तब इसे पूजा स्वीकार होने और आशीर्वाद मिलने का संकेत माना जाता है।
इस बार भी सिंधिया फूल गिरने का इंतजार करते रहे। करीब एक घंटे बाद फूल चादर पर गिरा और इसके साथ पूजा की प्रक्रिया पूरी की गई। इसके बाद सिंधिया देवघर से रवाना हुए।
महादजी सिंधिया से जुड़ी है कहानी
बाबा मंसूर शाह और सिंधिया परिवार के रिश्ते की कहानी मराठा शासक महादजी सिंधिया के समय से जुड़ी बताई जाती है। प्रचलित मान्यता के अनुसार 1761 के पानीपत युद्ध में महादजी सिंधिया घायल हो गए थे। परिवार को उनकी सलामती की चिंता थी। इसी दौरान उनकी मां और पत्नी बाबा मंसूर शाह के पास पहुंचीं।
परिवार से जुड़ी परंपरा के अनुसार संत ने उन्हें भरोसा दिलाया कि महादजी सुरक्षित हैं और वापस लौटेंगे। बाद में महादजी के जीवित लौटने के बाद परिवार ने इसे बाबा के आशीर्वाद से जोड़कर देखा। इसी घटना के बाद संत और सिंधिया परिवार के बीच आस्था का रिश्ता और मजबूत होने की बात कही जाती है।
क्या है ‘आधी रोटी’ का रहस्य?
इसी कहानी में ‘आधी रोटी’ का भी जिक्र आता है। परिवार से जुड़ी मान्यता के मुताबिक बाबा मंसूर शाह ने महादजी सिंधिया को आधी रोटी दी थी और पांच पीढ़ियों तक राज करने का आशीर्वाद दिया था। आज भी इस रोटी के अवशेषों को गोरखी के देवघर में सुरक्षित रखे जाने की बात सामने आती है।
यह कहानी ऐतिहासिक दस्तावेज से ज्यादा सिंधिया परिवार से जुड़ी परंपरा और लोकमान्यता के रूप में बताई जाती है। परिवार से जुड़े लोगों के अनुसार इस धरोहर की हर साल पूजा की जाती है।
सिंधिया ने मांगी सुख-शांति की दुआ
पूजा के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने बाबा मंसूर शाह के प्रति श्रद्धा जताई। उन्होंने देश और प्रदेश के लोगों के सुख, शांति और समृद्धि की कामना करने की बात कही। सिंधिया परिवार में लंबे समय से चली आ रही यह परंपरा आज भी उसी तरह जारी है और हर साल परिवार का मुखिया उर्स के दौरान गोरखी देवघर पहुंचता है।
ग्वालियर में बाबा मंसूर शाह की पूजा और सिंधिया परिवार की यह परंपरा इसलिए भी चर्चा में रहती है क्योंकि इसमें एक सूफी संत से जुड़ी आस्था और राजपरिवार की हिंदू धार्मिक परंपराएं एक ही देवघर में दिखाई देती हैं।
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