7 साल पहले ही मिल गई थी दूषित पानी की चेतावनी, नहीं जागा सिस्टम...36 मौतों का जिम्मेदार कौन?
इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी पीने से 36 लोगों की मौत के मामले की न्यायिक जांच रिपोर्ट में सिस्टम की गंभीर खामियां सामने आई हैं।

Indore Water Crisis: इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी पीने से 36 लोगों की मौत के मामले में हुई न्यायिक जांच ने प्रशासनिक व्यवस्था की गंभीर खामियों को उजागर किया है। हाईकोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस सुशील गुप्ता की अध्यक्षता वाले जांच आयोग ने माना कि लोगों को ऐसा पानी सप्लाई किया जा रहा था, जो पीने योग्य नहीं था। यह कोई ऐसी अचानक हुई त्रासदी नहीं थी, जिसे रोका नहीं जा सकता था। पानी-सीवरेज व्यवस्था की निगरानी में कमी, लापरवाही और जिम्मेदार अधिकारियों-कर्मचारियों की चूक से हालात बिगड़े थे।
7 साल तक दूषित पानी पीते रहे इंदौरवासी
आयोग ने 8 फरवरी 2019 की प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट का भी उल्लेख किया है। इसमें भागीरथपुरा के 60 ट्यूबवेल और हैंडपंपों का पानी निर्धारित गुणवत्ता मानकों पर खरा नहीं मिला था। बोर्ड ने चेताया था कि ऐसे पानी से स्वास्थ्य संबंधी खतरा हो सकता है और उचित क्लोरीनेशन के बाद ही इसका इस्तेमाल किया जाए।
आयोग के मुताबिक इस चेतावनी के बावजूद तत्कालीन निगम आयुक्त और अपर आयुक्त की ओर से समय पर प्रभावी कार्रवाई किए जाने का ठोस रिकॉर्ड नहीं मिला। रिपोर्ट में माना गया है कि उस समय कार्रवाई होती तो स्थिति को बिगड़ने से रोका जा सकता था।
यह कोई ऐसी अचानक हुई त्रासदी नहीं थी, जिसे रोका नहीं जा सकता था। पानी-सीवरेज व्यवस्था की निगरानी में कमी, लापरवाही और जिम्मेदार अधिकारियों-कर्मचारियों की चूक से हालात बिगड़े थे।
पानी और सीवर लाइन की व्यवस्था पर भी सवाल
जांच आयोग ने पेयजल और सीवरेज नेटवर्क की डिजाइन, रखरखाव और निगरानी व्यवस्था को भी जांच के दायरे में रखा। रिपोर्ट में कहा गया कि पानी और सीवर पाइपलाइन के बीच निर्धारित दूरी और जरूरी सुरक्षा उपायों का पालन बेहद जरूरी है।
क्रॉसिंग वाले स्थानों पर विशेष सावधानी, सीवर लाइन को संभव होने पर पानी की लाइन से नीचे रखने, गलत कनेक्शन रोकने और बैकफ्लो व लीकेज की निगरानी करने की जरूरत बताई गई है। इसके अलावा पानी के प्रेशर और गुणवत्ता की नियमित जांच तथा पाइपलाइन नेटवर्क के रखरखाव पर भी जोर दिया गया है।
टेंडर प्रक्रिया में देरी भी जांच के घेरे में
भागीरथपुरा में काम से जुड़ी टेंडर प्रक्रिया में भी देरी का उल्लेख रिपोर्ट में किया गया है। 15 अक्टूबर 2025 को अपर कमिश्नर रोहित सिसोनिया के स्तर पर चर्चा, इसके बाद 18 दिसंबर को संजीव श्रीवास्तव के साथ चर्चा और 26 दिसंबर को वित्तीय बोली खोले जाने का रिकॉर्ड रिपोर्ट में दर्ज है।
आयोग ने माना कि प्रक्रिया में हुई देरी को टाला जा सकता था और फाइलें अलग-अलग स्तरों पर लंबित रहीं।
टेंडर प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों और कर्मचारियों में कार्यकारी इंजीनियर संजीव कुमार श्रीवास्तव, सहायक अभियंता सरताज कुमार प्रजापति, उप अभियंता सम्यक जैन, प्रभारी तकनीकी अधिकारी रोहित राय, टेंडर उप अभियंता श्वेता सिंह और टेंडर क्लर्क प्रज्ञा तिवारी समेत अन्य नामों का रिपोर्ट में उल्लेख है। निवास बागरी और शरद सोनी की जिम्मेदारी का भी जिक्र किया गया है। एक स्थान पर तत्कालीन एडिशनल कमिश्नर भव्या मित्तल की जिम्मेदारी तय किए जाने की बात भी सामने आई है
आयोग ने पूछा- किस स्तर पर कितनी देरी हुई और उसके लिए कौन जिम्मेदार था?
आयोग ने टेंडर के विभिन्न चरणों में हुई देरी को भी गंभीर माना है। रिपोर्ट के अनुसार टेंडर फाइलों की प्रोसेसिंग में हुई देरी की जिम्मेदारी तय करने के लिए संबंधित समिति की भूमिका की जांच आवश्यक है। आयोग ने यह निर्धारित करने की जरूरत बताई है कि प्रक्रिया में किस स्तर पर कितनी देरी हुई और उसके पीछे वास्तविक कारण क्या था।
इस समिति में संजीव कुमार श्रीवास्तव, श्रीकांत कांटे, देवधर दरवाई और अभय राजनगांवकर शामिल थे। आयोग की टिप्पणी के बाद अब यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि टेंडर प्रक्रिया से जुड़े निर्णयों और फाइलों के निस्तारण में किस स्तर पर देरी हुई और क्या समय पर प्रक्रिया पूरी होने से भागीरथपुरा की स्थिति को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती थी।
शिवम वर्मा और प्रतिभा पाल को क्लीन चिट
रिपोर्ट में तत्कालीन निगम आयुक्त शिवम वर्मा को जिम्मेदार नहीं माना गया है। आयोग के अनुसार रिकॉर्ड में उनके स्तर पर ऐसी कोई विशेष चूक सामने नहीं आई, जिसके आधार पर उन्हें जिम्मेदार ठहराया जा सके। पूर्व निगम आयुक्त प्रतिभा पाल को भी आयोग ने क्लीन चिट दी है।
36 मौतों की त्रासदी ने खोली व्यवस्था की पोल
भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई 36 मौतों की घटना ने न केवल पेयजल व्यवस्था की सुरक्षा पर सवाल खड़े किए, बल्कि यह भी सामने ला दिया कि सरकारी तंत्र में किसी खतरे की शुरुआती चेतावनी मिलने के बाद उस पर कितनी गंभीरता से अमल किया जाता है। न्यायिक आयोग की रिपोर्ट में 2019 की पानी की गुणवत्ता संबंधी चेतावनी से लेकर पाइपलाइन और सीवरेज नेटवर्क की निगरानी, शिकायतों के निस्तारण और टेंडर प्रक्रिया में हुई देरी तक कई स्तरों पर खामियां दर्ज की गई हैं।
