नक्सलवाद के अंधेरे से विकास की रोशनी तक...बालाघाट में अब घर-घर पहुंच रही स्वास्थ्य सेवाएं
बालाघाट के कई गांवों के आदिवासियों का कहना है कि आज जब प्रदेश सरकार ने स्वास्थ्य कैंप लगाए, घर-घर जांच हुई तो बच्चों की बीमारी पता चली, उनका इलाज हो रहा है। नक्सलवाद के दौर में हमारे बच्चे बिना इलाज के तड़प कर दम तोड़ देते थे।
Balaghat News: नक्सलवाद का असर केवल हिंसा और सुरक्षा तक सीमित नहीं रहा। मध्य प्रदेश के बालाघाट के कई गांवों में इसने आम जिंदगी को भी लंबे समय तक प्रभावित किया।सैकड़ों गांवों में रहने वाले हजारों लोगों के लिए स्कूल, अस्पताल, सड़क और वाहन जैसी बुनियादी सुविधाएं दूर होती चली गईं। सरकारी योजनाओं का लाभ लेना भी आसान नहीं रहा।
सबसे ज्यादा परेशानी उन आदिवासी परिवारों को उठानी पड़ी, जिनका नक्सलवाद से कोई संबंध नहीं था। उन्हें सिर्फ अपने बच्चों के लिए स्कूल, बीमारी में इलाज, गांव तक सड़क और रोजगार चाहिए था। अब ऐसे इलाकों में परिस्थितियां बदलती नजर आ रही हैं। सरकारी अमला उन गांवों तक पहुंच रहा है, जहां कभी पहुंचना चुनौती माना जाता था।
पहले बीमारी का ही पता नहीं लगता था, अब इलाज भी मिल रहा
बालाघाट के नक्सल प्रभावित इलाकों में हाल के दिनों में बच्चों में कुपोषण और अलग-अलग बीमारियों से मौत के मामले सामने आए हैं। यह निश्चित तौर पर चिंता का विषय है। लेकिन इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी है।अब स्वास्थ्य विभाग की टीमें गांवों में जाकर बच्चों और ग्रामीणों की जांच कर रही हैं। बीमारी की पहचान हो रही है और जरूरत पड़ने पर मरीजों को अस्पताल पहुंचाया जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि बच्चों में बीमारी और पोषण की कमी अचानक पैदा नहीं हुई है। वे कई वर्षों से ऐसी परिस्थितियों का सामना करते आए हैं। फर्क यह है कि पहले बीमारी का पता समय पर नहीं चल पाता था और इलाज तक पहुंच बनाना भी मुश्किल था।
नक्सलवाद के दौर में इलाज तक पहुंचना था मुश्किल
ग्रामीण बताते हैं कि नक्सलवाद के दौर में कई बच्चे बीमारी से जूझते रहे, लेकिन समय पर उपचार नहीं मिल सका। मौसमी बीमारियों ने भी पहले कई बच्चों की जान ली। अस्पताल तक पहुंचने के लिए लंबी दूरी और सुरक्षा का डर अलग चुनौती था। कई बार सरकारी टीमों की मौजूदगी भी सामान्य बात नहीं थी। स्वास्थ्यकर्मियों को देखकर लोग रास्ता बदल लेते थे या उनसे दूरी बनाकर रखते थे। नक्सलियों का खौफ ऐसा था कि लोग अपनी परेशानी तक खुलकर नहीं बता पाते थे।
नक्सल गतिविधियों से मुक्ति के बाद भी ग्रामीणों के मन से डर तुरंत खत्म नहीं हुआ। सामान्य स्थिति लौटने में समय लगा। अब स्वास्थ्य विभाग की टीमें गांव-गांव पहुंच रही हैं। घरों में जाकर मरीजों की जांच की जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि करीब चार दशक बाद उन्हें सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं का इस तरह सीधा लाभ मिल रहा है।
मुख्यमंत्री के दौरे से बढ़ा भरोसा
मुख्यमंत्री मोहन यादव भी बालाघाट के ऐसे गांवों तक पहुंचे, जहां इससे पहले प्रदेश के किसी मुख्यमंत्री के पहुंचने की बात सामने नहीं आई थी। ग्रामीणों के मुताबिक मुख्यमंत्री के दौरे के बाद उन्हें यह भरोसा बढ़ा कि शासन और प्रशासन अब उनके बीच मौजूद है। यह भरोसा इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि नक्सलवाद खत्म होने के बाद भी लंबे समय तक ग्रामीण भय और असुरक्षा के माहौल से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाए थे।
घर-घर जाकर हो रही स्वास्थ्य जांच
स्वास्थ्य विभाग ने इन गांवों में व्यापक स्वास्थ्य अभियान शुरू किया है। इसके तहत 20 सर्वे टीम लगातार ग्रामीणों की स्वास्थ्य जांच कर रही हैं। इसके अलावा 4 मोबाइल मेडिकल यूनिट, 10 चिकित्सा अधिकारी और 4 एंबुलेंस तैनात की गई हैं। ये टीमें गांवों में जाकर लोगों की जांच कर रही हैं और जरूरत के मुताबिक उपचार उपलब्ध करा रही हैं।
980 घरों तक पहुंचा स्वास्थ्य अभियान
स्वास्थ्य विभाग ने करीब 10 गांवों के 980 घरों में स्वास्थ्य सर्वे और सुरक्षा अभियान चलाया है। इस अभियान का उद्देश्य केवल गंभीर मरीजों को अस्पताल पहुंचाना नहीं है। उन लोगों तक भी पहुंचना है, जो दूरी या दूसरी वजहों से अस्पताल नहीं जा पाते। घर-घर जाकर बीमारी की पहचान की जा रही है और मौके पर ही जरूरी उपचार दिया जा रहा है।
630 मरीजों की पहचान, 461 का घर पर इलाज
स्वास्थ्य विभाग की टीमों ने अब तक अलग-अलग बीमारियों से पीड़ित 630 मरीजों की पहचान की है। इनमें से 125 मरीजों को अस्पताल में भर्ती कराया गया। वहीं 461 मरीजों का इलाज घर पर ही किया गया और वे स्वस्थ हो चुके हैं। बच्चों की सेहत पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। पिछले एक महीने में अलग-अलग बीमारियों से पीड़ित 169 बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराया गया। इनमें से 125 बच्चे स्वस्थ होकर घर लौट चुके हैं। यानी जिन इलाकों में पहले बीमारी का पता लगाना भी मुश्किल था, वहां अब पहचान से लेकर उपचार तक की व्यवस्था पहुंच रही है।
बच्चों को विटामिन और जरूरी दवाएं
स्वास्थ्य अभियान के दौरान बच्चों के पोषण और बीमारी की रोकथाम पर भी काम किया जा रहा है। बच्चों को विटामिन-ए, डफर और जिंक की खुराक दी गई है। इसके अलावा 597 बच्चों को आयरन सिरप और 521 बच्चों को अल्बेंडाजोल की गोली दी गई। वहीं 63 बच्चों को मीजल्स का टीका लगाया गया।
इस अभियान का एक अहम हिस्सा प्रत्येक व्यक्ति का मेडिकल रिकॉर्ड तैयार करना भी है। दूर-दराज के इलाकों में मेडिकल रिकॉर्ड उपलब्ध होने से भविष्य में बीमारी के पैटर्न को समझने में मदद मिलेगी। इससे यह भी पता लगाया जा सकेगा कि किस इलाके में कौन सी बीमारी ज्यादा है और किन परिवारों को नियमित निगरानी की जरूरत है।
जहां नक्सली कैंप थे, वहां अब जनसुविधा केंद्र
बालाघाट में बदलाव केवल स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित नहीं है। जिन जगहों पर कभी नक्सली कैंप या गतिविधियों का प्रभाव था, वहां अब जनसुविधा केंद्र और सरकारी गतिविधियां दिखाई दे रही हैं। जहां कभी बंदूक का डर था, वहां अब डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी थर्मामीटर, दवाइयां और पोषण सामग्री लेकर पहुंच रहे हैं।
सड़क का मतलब अब सिर्फ सड़क नहीं
इन इलाकों में विकास को सामान्य शहरों के पैमाने से देखना शायद सही नहीं होगा। नक्सल प्रभावित गांव में सड़क का मतलब केवल आवागमन नहीं है। सड़क बनने का अर्थ प्रशासन, एंबुलेंस और स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच आसान होना भी है। इसी तरह स्वास्थ्य केंद्र सिर्फ एक सरकारी भवन नहीं है। वह ग्रामीणों को बीमारी के समय समय पर उपचार मिलने का रास्ता देता है।स्कूल की इमारत बच्चों के लिए शिक्षा के साथ उस भविष्य का रास्ता खोलती है, जिसमें बंदूक की जगह किताब होती है।
100 से ज्यादा गांवों के लिए 200 करोड़ से अधिक
बालाघाट के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास को गति देने के लिए राज्य सरकार की ओर से भी बड़ी राशि उपलब्ध कराई गई है। पहले चरण में 100 से ज्यादा गांवों के लिए 200 करोड़ रुपये से अधिक की राशि दिए जाने की बात सामने आई है। इन इलाकों में सुरक्षा और विकास को साथ लेकर चलना इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि दशकों तक दोनों ही मोर्चों पर चुनौतियां रही हैं।
केंद्र की रणनीति से बदली तस्वीर
नक्सलवाद के खिलाफ केंद्र सरकार की रणनीति का असर अब उन इलाकों में भी दिखाई दे रहा है, जहां लंबे समय तक सरकारी पहुंच सीमित रही। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के नेतृत्व में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा अभियान के साथ विकास पर भी जोर दिया गया। नक्सल गतिविधियों में कमी आने के बाद अब सरकारी मशीनरी के लिए ऐसे इलाकों तक पहुंच बनाना आसान हुआ है। इसका सीधा फायदा उन सामान्य परिवारों को मिल रहा है, जो वर्षों से केवल सामान्य सुविधाओं की उम्मीद कर रहे थे।
बालाघाट को थोड़ा वक्त दीजिए
आज बालाघाट की तुलना भोपाल या इंदौर जैसे विकसित शहरों से करना सही तस्वीर सामने नहीं रखेगा। किसी इलाके के विकास को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि वह अपनी पिछली स्थिति से कितनी दूर आया है। बालाघाट के नक्सल प्रभावित गांवों में करीब 40 साल बाद स्वास्थ्य विभाग की पूरी टीम पहुंच पा रही है। ऐसे में बच्चों में बीमारी सामने आना चिंता जरूर है, लेकिन बीमारी की पहचान होना और उसका इलाज शुरू होना भी बदलाव का महत्वपूर्ण संकेत है।
आंकड़े बता रहे हैं बदलाव की कहानी
एक तरफ कुपोषण और बीमारी की समस्या सामने आई है। दूसरी तरफ उसी समस्या से निपटने के लिए सरकारी तंत्र गांवों तक पहुंचा है।
- 980 घरों में सर्वे हुआ।
- 630 मरीजों की पहचान हुई।
- 461 मरीजों का घर पर इलाज किया गया।
- 169 बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराया गया।
- 125 बच्चे स्वस्थ होकर घर लौट चुके हैं।
इसके अलावा सैकड़ों बच्चों को आयरन, विटामिन और दूसरी जरूरी दवाएं दी गई हैं।
बंदूक के साये से विकास की राह तक
बालाघाट की कहानी अभी पूरी नहीं हुई है। कुपोषण, बीमारी, सड़क, शिक्षा और रोजगार जैसे सवाल अभी भी मौजूद हैं। लेकिन फर्क यह है कि अब इन समस्याओं की आवाज जंगल और डर के बीच दबकर नहीं रह रही। जिन रास्तों पर कभी बंदूक का खौफ था, वहां अब विकास का पहिया आगे बढ़ रहा है। जिन गांवों में सरकारी अमले की मौजूदगी मुश्किल थी, वहां अब स्वास्थ्यकर्मी घरों तक पहुंच रहे हैं। जिन बच्चों की बीमारी पहले सामने नहीं आ पाती थी, अब उनकी जांच और इलाज हो रहा है। नक्सलवाद के खिलाफ सुरक्षा कार्रवाई ने जहां डर का दायरा कम किया, वहीं उसके बाद सरकारी तंत्र की बढ़ती पहुंच ने विकास के लिए रास्ता तैयार किया है। बालाघाट को उसके पुराने डर की तस्वीर से नहीं, बल्कि बदलती वर्तमान परिस्थितियों से देखने की जरूरत है। जहां कभी नक्सली कैंप थे, वहां अब जनसुविधा केंद्र हैं। जहां कभी बंदूक की आवाज सुनाई देती थी, वहां अब स्वास्थ्यकर्मियों की दस्तक और स्कूल की घंटी सुनाई दे रही है।
बालाघाट में बदलाव अभी जारी है, लेकिन करीब चार दशक के अंधेरे के बाद स्वास्थ्य, विकास और सरकारी पहुंच की रोशनी अब इन गांवों तक पहुंचती दिखाई दे रही है।
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