308 पहिए वाली मशीन 6 महीने में बेल्जियम से UP पहुंची, गन्ने से प्लास्टिक बनाने की तैयारी
यह मशीन सिर्फ अपने आकार और वजन के कारण चर्चा में नहीं है। इसका संबंध प्लास्टिक के ऐसे विकल्प से है, जिसे गन्ने और चीनी से तैयार करने की योजना है।
Lakhimpur Khiri Bioplastic Plant: पांच महीने का लंबा सफर, करीब 1,600 किलोमीटर की सड़क यात्रा और 200 टन वजन वाली विशाल मशीन बेल्जियम से भारत आ चुकी है। । उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में पहुंचा 308 पहियों वाला महाट्रक अब अपनी मंजिल तक पहुंच चुका है। इस ट्रक पर बेल्जियम से मंगाया गया एक विशाल औद्योगिक रिएक्टर लदा था, जिसे कुंभी स्थित चीनी मिल परिसर में बन रहे बायोप्लास्टिक प्लांट में लगाया जाएगा। इस मशीन के पहुंचने से देश के पहले इंटीग्रेटेड PLA बायोप्लास्टिक प्लांट की तैयारियों को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी।
यह मशीन सिर्फ अपने आकार और वजन के कारण चर्चा में नहीं है। इसका संबंध प्लास्टिक के ऐसे विकल्प से है, जिसे गन्ने और चीनी से तैयार करने की योजना है। अगर प्लांट तय क्षमता के साथ काम शुरू करता है, bioplasticतो इससे उद्योग और कृषि क्षेत्र के लिए नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
बेल्जियम से भारत तक कैसे पहुंची मशीन?
इस विशाल मशीन को समुद्री जहाज के जरिए बेल्जियम से ओडिशा के पारादीप बंदरगाह लाया गया था। इसके बाद इसे विशेष मल्टी-एक्सल हाइड्रोलिक ट्रेलर पर रखकर सड़क मार्ग से उत्तर प्रदेश पहुंचाया गया। सार, इस यात्रा में करीब 6 महीने लगे और ट्रक ने लगभग 1,600 किलोमीटर का सफर तय किया।
इतने भारी उपकरण को सुरक्षित पहुंचाना आसान नहीं था। ट्रेलर को रास्ते में कई जिलों और व्यस्त सड़कों से गुजरना पड़ा। बिजली की तारों, सड़क किनारे लगे संकेतकों और दूसरे अवरोधों को देखते हुए परिवहन की व्यवस्था करनी पड़ी। विशाल ट्रक को देखने के लिए रास्ते में कई जगह लोग जमा हुए और इसके वीडियो सोशल मीडिया पर भी चर्चा में रहे।
3,080 करोड़ रुपये का बायोप्लास्टिक प्रोजेक्ट
कुंभी चीनी मिल परिसर में करीब 3,080 करोड़ रुपये की लागत से यह प्लांट तैयार किया जा रहा है। इसकी प्रस्तावित सालाना उत्पादन क्षमता करीब 80 हजार टन PLA यानी पॉलीलैक्टिक एसिड प्लास्टिक बताई गई है।
इसमें गन्ने और चीनी को कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा। सबसे पहले चीनी से लैक्टिक एसिड तैयार होगा। इसके बाद विशेष रासायनिक प्रक्रिया से PLA बनाया जाएगा। इस प्रक्रिया में साइक्लाइजेशन रिएक्टर अहम भूमिका निभाएगा। इसी वजह से बेल्जियम से आई मशीन को परियोजना का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।
प्लास्टिक प्रदूषण कम करने की उम्मीद
पारंपरिक प्लास्टिक कचरे का निपटारा बड़ी चुनौती है। इसके विकल्प के तौर पर PLA जैसे बायोप्लास्टिक पर काम किया जा रहा है। इससे पैकेजिंग, कपड़ा, धागा और कुछ अन्य उत्पाद बनाए जा सकते हैं। हालांकि, ऐसे उत्पादों के पर्यावरण में टूटने की प्रक्रिया उनकी बनावट और निपटान की परिस्थितियों पर निर्भर करती है। इसलिए इसे हर परिस्थिति में अपने आप खत्म होने वाला प्लास्टिक मानना सही नहीं होगा।
इस परियोजना से गन्ना उत्पादक किसानों और स्थानीय उद्योगों को भी फायदा मिलने की उम्मीद है। अब मशीन की स्थापना और प्लांट को चालू करने की अगली प्रक्रिया पर नजर रहेगी। असली नतीजे उत्पादन शुरू होने के बाद ही सामने आएंगे।
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