वायुसेना के 'गजराज' ने रचा इतिहास, 13 हजार फीट की ऊंचाई पर उतरा; दुनिया का सबसे ऊंचा एयरबेस
इस विमान के अंदर सीधे टी-72 मुख्य युद्धक टैंक को लोड किया जा सकता है। इसके अलावा यह एक साथ 6.5 टन क्षमता वाले तीन सैन्य ट्रक भी ले जाने में सक्षम है।
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IAF Gajraj: भारतीय वायुसेना ने पूर्वी लद्दाख में अपनी ताकत और तकनीकी क्षमता का नया प्रदर्शन किया है। वायुसेना के भारी परिवहन विमान IL-76MD ने शनिवार 7 नवंबर को लद्दाख के न्योमा एयरफील्ड पर 13,629 फीट की ऊंचाई पर सफल लैंडिंग की। 'गजराज' के नाम से पहचाने जाने वाले इस विमान की यह दुनिया में अब तक की सबसे ऊंचाई पर की गई लैंडिंग है। भारतीय वायुसेना ने खुद इस उपलब्धि की जानकारी देते हुए इसे एविएशन के इतिहास में नया मुकाम बताया है।
इस उपलब्धि का महत्व केवल एक रिकॉर्ड बनाने तक सीमित नहीं है। न्योमा एयरबेस चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के नजदीक पूर्वी लद्दाख में स्थित है। यहां भारी परिवहन विमान के उतरने से भारतीय सेना को सीमावर्ती इलाकों तक टैंक, सैन्य वाहन, जरूरी उपकरण और सैनिक पहुंचाने में मदद मिलेगी। इससे किसी आपात स्थिति में सेना की तैयारियों को तेजी से आगे बढ़ाया जा सकेगा।
एक साथ टैंक और तीन बड़े ट्रक ले जा सकता है गजराज
IL-76MD चार इंजन वाला भारी परिवहन विमान है। इसे रूस में तैयार किया गया है और भारतीय वायुसेना लंबे समय से इसका इस्तेमाल कर रही है। इसकी सबसे बड़ी खासियत भारी सामान को एक जगह से दूसरी जगह तक पहुंचाने की क्षमता है।
इस विमान के अंदर सीधे टी-72 मुख्य युद्धक टैंक को लोड किया जा सकता है। इसके अलावा यह एक साथ 6.5 टन क्षमता वाले तीन सैन्य ट्रक भी ले जाने में सक्षम है। इसके जरिए सैनिकों के साथ भारी मशीनरी और दूसरे जरूरी सैन्य संसाधन भी पहुंचाए जा सकते हैं।
इतनी ऊंचाई पर लैंडिंग आसान नहीं
13,629 फीट की ऊंचाई पर किसी भारी विमान को उतारना बड़ी चुनौती होती है। इतनी ऊंचाई पर हवा का दबाव और घनत्व कम हो जाता है। इसका असर विमान के इंजन और पंखों को मिलने वाले लिफ्ट पर पड़ता है। ऐसे में विमान को संतुलित रखना और सुरक्षित तरीके से रनवे पर उतारना पायलटों के लिए मुश्किल होता है।
इसके लिए विमान में ईंधन की मात्रा, सामान का वजन, तापमान और रनवे की स्थिति का बारीकी से आकलन करना पड़ता है। न्योमा में गजराज की सफल लैंडिंग वायुसेना के पायलटों की ट्रेनिंग और तकनीकी तैयारी को भी दिखाती है।
2009 में पहली बार उतरा था AN-32
न्योमा एयरफील्ड का भी अपना इतिहास है। सितंबर 2009 में यहां पहली बार वायुसेना के मध्यम परिवहन विमान AN-32 ने लैंडिंग की थी। इसके बाद इस जगह को आधुनिक एयरबेस के रूप में विकसित किया गया। नवंबर 2025 में वायुसेना प्रमुख ने C-130J सुपर हरक्यूलिस विमान से यहां पहुंचकर उन्नत एयरबेस का औपचारिक उद्घाटन किया था। अब IL-76MD की लैंडिंग से न्योमा एयरबेस की क्षमता का एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आया है।
लद्दाख में सेना की पहुंच होगी मजबूत
पूर्वी लद्दाख में वर्ष 2020 के बाद से सैन्य तैयारियों और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया गया है। ऐसे में न्योमा जैसे एयरबेस की भूमिका काफी अहम है। सड़क मार्ग से भारी सैन्य सामान पहुंचाने में समय लग सकता है, जबकि बड़े परिवहन विमान के जरिए इसे तेजी से आगे के इलाकों तक पहुंचाया जा सकता है। गजराज की यह लैंडिंग भारत की रणनीतिक एयरलिफ्ट क्षमता को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है।


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