300 रुपये की रिश्वत का मामला 30 साल तक चला, MP हाई कोर्ट से पटवारी को मिली राहत; रंगेहाथों पकड़े जाने का था आरोप
इस फैसले को सरकार ने चुनौती दी और वर्ष 1998 में हाईकोर्ट में अपील दाखिल की गई। इसके बाद मामला लंबे समय तक अदालत में चलता रहा और अब हाईकोर्ट ने सरकार की अपील पर फैसला सुनाया है।
MP News: मध्य प्रदेश में एक पटवारी के 300 रुपये रिश्वत लेने का मामला 30 साल तक अदालत में चला। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सरकार की अपील को खारिज करते हुए तत्कालीन पटवारी मुन्नालाल को बरी कर दिया है। मामला साल 1996 में सामने आया था। 1997 में जिला अदालत ने पटवारी को बरी भी कर दिया था, लेकिन फैसले के खिलाफ राज्य सरकार की तरफ से हाई कोर्ट में अपील की गई थी। जिसका फैसला आने में लगभग 3 दशकों का समय लग गया। कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध सबूतों के आधार पर पटवारी को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है।
रंगेहाथों 300 रुपये रिश्वत लेने का आरोप था
मामला वर्ष 1996 का है। अभियोजन के अनुसार खुरई क्षेत्र में पटवारी के पद पर तैनात मुन्नालाल से शिकायतकर्ता वीर सिंह ने डुप्लीकेट भू-अधिकार और ऋण पुस्तिका जारी कराने के लिए संपर्क किया था। आरोप था कि इसके बदले पटवारी ने 300 रुपये की रिश्वत मांगी। शिकायत के बाद लोकायुक्त पुलिस ने कार्रवाई की और 17 अक्टूबर 1996 को पटवारी को 300 रुपये लेते हुए पकड़ने का दावा किया था।
इसके बाद मामला जिला अदालत पहुंचा। दिसंबर 1997 में ट्रायल कोर्ट ने मुन्नालाल को दोषमुक्त कर दिया। इस फैसले को सरकार ने चुनौती दी और वर्ष 1998 में हाईकोर्ट में अपील दाखिल की गई। इसके बाद मामला लंबे समय तक अदालत में चलता रहा और अब हाईकोर्ट ने सरकार की अपील पर फैसला सुनाया है।
रिकॉर्डिंग और आवाज की पहचान पर सवाल
हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान मामले से जुड़े सबूतों की जांच की गई। कोर्ट ने पाया कि कथित रिश्वत मांगने की मूल रिकॉर्डिंग ट्रायल कोर्ट में सत्यापित नहीं कराई गई थी। इसके अलावा रिकॉर्डिंग में मौजूद आवाज की पहचान भी आरोपी मुन्नालाल की आवाज के रूप में स्थापित नहीं की गई।
कोर्ट के सामने यह सवाल भी आया कि शिकायतकर्ता के पास सरकारी बकाया राशि थी। राजस्व रिकॉर्ड के मुताबिक वीर सिंह पर 325 रुपये और उस पर ब्याज की राशि सरकारी तौर पर बकाया थी। सुनवाई के दौरान यह संभावना भी सामने आई कि बरामद 300 रुपये इसी बकाया राशि से जुड़े हो सकते हैं।
रिश्वत की रकम को लेकर भी अलग-अलग बयान
मामले की सुनवाई में शिकायतकर्ता के बयानों में भी कुछ अंतर सामने आया। अलग-अलग मौकों पर कथित रिश्वत की मांग 450 और 500 रुपये बताई गई। इसके अलावा रिश्वत मांगने के समय कौन-कौन लोग मौजूद थे, इस संबंध में भी बयानों में अंतर पाया गया। इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने अभियोजन के सबूतों को पर्याप्त नहीं माना।
केवल पैसे मिलने से अपराध साबित नहीं
हाई कोर्ट ने कहा कि सिर्फ रकम बरामद होने और फिनालफ्थेलीन टेस्ट में परिणाम आने से यह साबित नहीं हो जाता कि आरोपी ने रिश्वत की मांग की थी और उसे अवैध रूप से स्वीकार किया था। अदालत ने माना कि ट्रायल कोर्ट का दोषमुक्त करने का फैसला उपलब्ध साक्ष्यों पर आधारित था और उसमें हस्तक्षेप करने का पर्याप्त कारण नहीं है।
इसी आधार पर जस्टिस संजय एस. कलगांवकर की एकल पीठ ने राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी और तत्कालीन पटवारी को दोषमुक्त करने वाले निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा।
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