श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए भयानक आतंकी हमले को लेकर राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की जांच में एक बड़ा और हैरान करने वाला खुलासा हुआ है। जांच से साफ हुआ है कि यह हमला कोई अचानक नहीं किया गया था, बल्कि इसके पीछे चार साल लंबी साजिश थी। इस हमले को अंजाम देने के लिए जिन मोबाइल फोनों का इस्तेमाल किया गया, उन्हें पाकिस्तान से मंगवाया गया था। सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि इन फोनों को खरीदने के लिए पाकिस्तान के एक ऐसे बैंक से पैसा लगाया गया था, जिसका नाम पहले भी आतंकी गतिविधियों में सामने आ चुका है।
26 लोगों की जान गई
पिछले साल पहलगाम में हुए इस आत्मघाती हमले में 26 लोगों की जान चली गई थी, जिनमें ज्यादातर हिंदू श्रद्धालु और पर्यटक शामिल थे। इस घटना के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच कड़वाहट बहुत ज्यादा बढ़ गई थी। भारत ने सीधे तौर पर पाकिस्तान को कटघरे में खड़ा किया था, वहीं पाकिस्तान हमेशा की तरह इन आरोपों से पल्ला झाड़ता रहा।
इसके बाद दोनों देशों की सेनाओं के बीच हवाई हमले, ड्रोन और सीमा पर भारी गोलाबारी के कारण चार दिनों तक युद्ध जैसी स्थिति बन गई थी। अब एनआईए और जम्मू-कश्मीर पुलिस को ऐसे पुख्ता सबूत मिले हैं, जो यह साबित करते हैं कि आतंकियों की यह साजिश बेहद सुनियोजित थी।
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दाचीगाम मुठभेड़ में ढेर हमलावर, मोबाइल बने अहम सुराग
सुरक्षा बलों ने श्रीनगर के दाचीगाम इलाके में एक बड़ा सैन्य अभियान ‘ऑपरेशन महादेव’ चलाया था। इस मुठभेड़ में सुरक्षा बलों ने तीन खूंखार आतंकियों सुलेमान शाह, हबीब ताहिर उर्फ जिबरान और हमजा अफगानी को मार गिराया था।
इन आतंकियों के शवों के पास से दो मोबाइल फोन बरामद हुए थे, जो इस पूरी साजिश का पर्दाफाश करने में सबसे बड़े मददगार साबित हुए। आतंकियों के पास शाओमी कंपनी के रेडमी सीरीज के दो फोन (रेडमी 9T और रेडमी नोट 12) मिले थे।
मोबाइल रिकॉर्ड ने खोली कराची और बैंक की भूमिका
जब जांच एजेंसियों ने फोन के खास पहचान नंबर (IMEI) के जरिए मोबाइल कंपनी से संपर्क किया, तो फोन का पूरा इतिहास सामने आ गया। रिकॉर्ड से पता चला कि पहला फोन जनवरी 2021 में पाकिस्तान के कराची की एक कंपनी ने वैध तरीके से मंगवाया था।
इस खेप को मंगाने के लिए कराची के ‘फेसल बैंक’ ने कागजी और वित्तीय मदद दी थी। यह वही बैंक है जिसका नाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंधित संगठनों की मदद करने और उनके खाते चलाने के मामलों में पहले भी उछल चुका है।
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बिना सिम-नेटवर्क के सालों बंद रहे मोबाइल
जांच में सबसे अजीब बात यह सामने आई कि यह फोन जनवरी 2021 में पाकिस्तान तो पहुंच गया था, लेकिन अगले चार साल तक इसे कभी चालू ही नहीं किया गया। इसमें न तो कोई सिम कार्ड डाला गया और न ही कोई कॉल की गई। साल 2025 में यह अचानक चालू हुआ और सीधे पहलगाम हमले के आतंकियों के हाथों में पहुंच गया।
ठीक इसी तरह दूसरा फोन भी साल 2023 में लाहौर मंगाया गया था और वह भी हमले से ठीक पहले तक पूरी तरह बंद था। जांच अधिकारियों का मानना है कि यह कोई इत्तेफाक नहीं है, बल्कि इन फोनों को किसी बड़े हमले के लिए सुरक्षित छिपाकर रखा गया था।
पकड़ से बचने को वायरलेस तकनीक का सहारा
जांच में यह भी पता चला है कि इन दोनों फोनों में कोई भी कॉल रिकॉर्ड, मैसेज या इंटरनेट चैट नहीं मिली। असल में आतंकी पकड़े जाने के डर से मोबाइल नेटवर्क या इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं कर रहे थे।
वे बातचीत करने के लिए ‘लॉन्ग-रेंज रेडियो’ तकनीक का उपयोग कर रहे थे, जिसे बिना इंटरनेट या मोबाइल टावर के भी कई किलोमीटर दूर से सुरक्षित तरीके से चलाया जा सकता है। फिलहाल जांच एजेंसियां आतंकियों के इस पूरे मददगार नेटवर्क को खंगालने में जुटी हैं।