Thalapathy Vijay : साल 1991 में आई इधायम की कुछ पंक्तियां उस दौर की उदासी और ठहराव को बयां करती थीं और तमिलनाडु की राजनीति भी कुछ ऐसी ही लगती थी। हर तरफ गर्मी, ठहराव और बदलाव की कमी। यही तस्वीर कई सालों तक राज्य की राजनीति में भी नजर आती रही, जहां विकल्प बेहद सीमित थे और जनता एक तरह के राजनीतिक चक्र में फंसी हुई थी।
दो दलों के बीच सिमटी राजनीति
तमिलनाडु की राजनीति लंबे समय तक सिर्फ दो दलों AIADMK और DMK के इर्द-गिर्द घूमती रही। एक तरफ जे. जयललिता (J. Jayalalithaa) का करिश्माई नेतृत्व, तो दूसरी ओर एम. करुणानिधि (M. Karunanidhi) की वैचारिक पकड़। करीब 60 साल तक इन दोनों दलों ने बारी-बारी से सत्ता संभाली और राज्य की राजनीति को लगभग दो हिस्सों में बांट दिया।
इस दौरान तमिल पहचान, भाषा और संस्कृति जैसे मुद्दे राजनीति के केंद्र में रहे, जबकि बुनियादी समस्याएं अक्सर पीछे छूटती रहीं। व्यक्तित्व आधारित राजनीति इतनी मजबूत हो गई कि आम जनता के मुद्दे गौण होते चले गए।
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बदलाव की जरूरत क्यों महसूस हुई?
समय के साथ लोगों के भीतर एक सवाल उठने लगा- क्या कोई तीसरा विकल्प नहीं है? बिजली कटौती, खराब इंफ्रास्ट्रक्चर और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे आम लोगों की जिंदगी को प्रभावित कर रहे थे, लेकिन राजनीति में इन पर उतना फोकस नहीं दिखता था।
चेन्नई जैसे बड़े शहरों में भी हालात अलग नहीं थे। जनता के सामने एक ही विकल्प था, इन दो दलों में से किसी एक को चुनना। यही कारण था कि बदलाव की मांग धीरे-धीरे मजबूत होती गई, लेकिन कोई ठोस विकल्प सामने नहीं आ रहा था।
फिल्मी दुनिया से राजनीति तक का सफर
दक्षिण भारत की राजनीति में फिल्मी सितारों का प्रभाव हमेशा से रहा है। एम. जी. रामचन्द्रन, एन. टी. रामा राव और जयललिता जैसे नाम इसका उदाहरण हैं। ऐसे में जब Vijay ने राजनीति में कदम रखा, तो इसे एक बड़े बदलाव की शुरुआत माना गया।
हालांकि कमल हासन (Kamal Haasan) जैसे दिग्गज पहले भी कोशिश कर चुके थे, लेकिन उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिली। इसलिए विजय की एंट्री को लेकर भी शुरुआत में संदेह था।
विजय की ऐतिहासिक जीत
इस चुनाव में लगभग सभी एग्जिट पोल विजय की पार्टी को मामूली सीटें दे रहे थे, लेकिन नतीजे बिल्कुल उलट निकले। चेन्नई से लेकर मदुरै और कोंगू नाडु तक विजय ने जबरदस्त प्रदर्शन किया और पहली ही बार में खुद को एक बड़े राजनीतिक खिलाड़ी के रूप में स्थापित कर लिया। उनकी यह जीत इसलिए खास है क्योंकि इसने तमिलनाडु की दशकों पुरानी दो-पार्टी व्यवस्था को चुनौती दी है। अब राजनीति सिर्फ AIADMK और DMK तक सीमित नहीं रही।
नए युग की शुरुआत
विजय की पार्टी का ‘सीटी’ प्रतीक भी एक नए संदेश के साथ सामने आया है, बदलाव का संकेत। जिस तरह चेन्नई सुपर किंग्स का ‘व्हिसल पोडु’ (Whistle Podu) नारा मशहूर है, उसी तरह अब राजनीति में भी नई ऊर्जा देखने को मिल रही है।
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यह जीत सिर्फ एक चुनावी जीत नहीं है, बल्कि तमिलनाडु की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत है। अब देखना होगा कि यह बदलाव कितनी दूर तक जाता है और क्या यह वास्तव में राज्य की राजनीति को नई दिशा दे पाता है।