Sabarimala Case Hearing : नई दिल्ली। देश में धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश को लेकर बड़ा संवैधानिक सवाल एक बार फिर चर्चा में है। केरल के सबरीमाला मंदिर से शुरू हुआ यह मामला अब मस्जिद, दरगाह और अन्य धार्मिक स्थलों तक पहुंच चुका है। सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे पर लगातार सुनवाई जारी है और आज बहस का 9वां दिन रहा। अदालत में आस्था, परंपरा और समानता के अधिकार के बीच संतुलन को लेकर तीखी दलीलें दी जा रही हैं।
इस दौरान मस्जिद दरगाह में महिलाओं के प्रवेश के खिलाफ दलील दे रहे एडवोकेट निजाम पाशा ने कहा कि अगर किसी मोहल्ले की मस्जिद सबके लिए खुली हो तो भी कोई जाकर घंटी नहीं बजा सकता। आरती नहीं कर सकता, क्योंकि उस जगह की अपनी धार्मिक मर्यादा है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला महिलाओं के धार्मिक स्थलों में प्रवेश और वहां होने वाले कथित भेदभाव से जुड़ा है। खास तौर पर सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को लेकर शुरू हुई कानूनी लड़ाई अब देश के अलग-अलग धर्मों की परंपराओं तक पहुंच गई है।
कोर्ट में किन 7 सवालों पर बहस?
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में 7 बड़े संवैधानिक सवाल तय किए हैं, जिनमें सबसे अहम है- धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा क्या है, ‘संवैधानिक नैतिकता’ क्या होती है और क्या अदालत धार्मिक परंपराओं में दखल दे सकती है? साथ ही यह भी सवाल है कि व्यक्तिगत अधिकार (Article 25) और धार्मिक संस्थाओं के अधिकार (Article 26) में संतुलन कैसे बनाया जाए।
‘धार्मिक नियम हमेशा ऊपर नहीं’
सुनवाई के दौरान एडवोकेट निजाम पाशा ने कहा कि कोई व्यक्ति हिजाब को जरूरी मान सकता है, लेकिन स्कूल के अपने नियम होते हैं। यानी हर धार्मिक मान्यता संस्थागत नियमों से ऊपर नहीं हो सकती। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर कोई मस्जिद सबके लिए खुली हो, तब भी वहां जाकर कोई अपनी मर्जी से कुछ भी नहीं कर सकता, क्योंकि हर जगह की अपनी धार्मिक मर्यादा होती है।
‘हर परंपरा भेदभाव नहीं होती’
कामाख्या मंदिर का उदाहरण देते हुए एक वकील ने कहा कि हर धार्मिक प्रथा को भेदभाव नहीं कहा जा सकता। कुछ परंपराएं महिलाओं की शक्ति का उत्सव भी होती हैं। वहीं कुछ वकीलों का मानना है कि अगर किसी परंपरा में क्रूरता हो, तभी कोर्ट को दखल देना चाहिए।
‘धार्मिक अधिकार पहले व्यक्ति का’
एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय ने दलील दी कि धार्मिक अधिकार सबसे पहले व्यक्ति का होता है, न कि किसी संस्था का। उन्होंने कहा कि अगर संस्थाओं को ज्यादा अधिकार दिए गए तो इससे सामाजिक विभाजन बढ़ सकता है।
जजों ने भी उठाए अहम सवाल
सुनवाई के दौरान जजों ने पूछा कि अगर हर जगह को धार्मिक स्थल मान लिया जाए, तो क्या उसके नाम पर कोई भी दावा किया जा सकता है? कोर्ट ने यह भी साफ किया कि धार्मिक स्वतंत्रता के साथ-साथ व्यवस्था और कानून का पालन भी जरूरी है।
सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री विवाद की टाइम लाइन
- 1990: केरल हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गई, जिसमें सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर बैन लगाने की मांग की गई।
- 1991: केरल हाईकोर्ट ने 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया।
- 2006: इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन ने केरल हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
- 2008: दो साल बाद इस मामले को 3 जजों की बेंच को सौंपा गया।
- जनवरी 2016: सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिबंध पर सवाल उठाया और कहा कि यह संविधान के तहत संभव नहीं है।
- नवंबर 2016: केरल की ओमन चांडी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह मंदिर के गर्भगृह में महिलाओं के प्रवेश के पक्ष में है।
- 2017: सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को 5 जजों की संविधान पीठ को सौंप दिया।
- सितंबर 2018: सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच ने 4:1 के बहुमत से एंट्री बैन के आदेश को रद्द कर दिया। केरल सरकार ने इस फैसले को लागू करने के लिए समय मांगा।
- 2018-2019: राज्य में कई जगह विरोध और प्रदर्शन हुए।
- 2 जनवरी 2019: पहली बार 2 महिलाओं ने मंदिर में प्रवेश किया।
- फरवरी 2019: अदालत ने सितंबर 2018 के फैसले की समीक्षा की मांग करने वाली याचिकाओं पर अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया।
- 14 नवंबर 2019: सुप्रीम कोर्ट ने 7 जजों की बेंच को भेजा। साथ ही अन्य धर्मों में महिलाओं के अधिकारों से जुड़े सवाल भी जोड़ दिए।
- 2020: सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस एसए बोबडे ने 9 जजों की संविधान पीठ बनाई।
- 2020-2025: इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चलती रही। क्या ‘धार्मिक परंपरा’ बनाम ‘समानता’ में किसे प्राथमिकता दी जाए।
- 7 अप्रैल 2026: सुनवाई शुरू, 22 अप्रैल को सुनवाई खत्म।
आगे क्या?
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है और आने वाला फैसला बेहद अहम माना जा रहा है। यह तय करेगा कि देश में धार्मिक परंपराओं और महिलाओं के अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाएगा। साफ है कि यह मामला सिर्फ आस्था का नहीं, बल्कि संविधान और बराबरी के अधिकार का भी है।