Nirmala Sapre Case : भोपाल। मध्य प्रदेश की राजनीति से जुड़े बहुचर्चित दल-बदल मामले में कांग्रेस को हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। बीना विधानसभा क्षेत्र की विधायक निर्मला सप्रे के खिलाफ दायर याचिका को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है। याचिका में दल-बदल कानून के तहत कार्रवाई करते हुए उनका विधानसभा सदस्यता समाप्त करने की मांग की गई थी। हाईकोर्ट ने कहा कि मामला पहले से ही विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष विचाराधीन है और कानूनी प्रक्रिया जारी है। इसलिए इस स्तर पर अदालत के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। फैसले के बाद कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी शुरू कर दी है।
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हाईकोर्ट ने क्यों खारिज की याचिका?
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने कहा कि इस मामले में विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष सुनवाई चल रही है। संबंधित पक्षों के बयान भी दर्ज किए जा चुके हैं।
ऐसे में अदालत को कोई अतिरिक्त निर्देश जारी करने की जरूरत नहीं है। हाईकोर्ट ने माना कि संवैधानिक प्रक्रिया अपने निर्धारित तरीके से आगे बढ़ रही है और फिलहाल उसमें हस्तक्षेप उचित नहीं होगा।
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उमंग सिंघार ने फैसले पर जताई नाराजगी
हाईकोर्ट के फैसले के बाद विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अदालत ने स्वेच्छा से पार्टी छोड़ने के पहलू पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। उन्होंने फैसले को निराशाजनक बताते हुए कहा कि कांग्रेस अब इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी। उनके अनुसार, दल-बदल कानून के प्रावधानों का पालन सुनिश्चित करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जाएगा।
कांग्रेस ने याचिका में क्या मांग की थी?
कांग्रेस की ओर से दायर याचिका में कहा गया था कि बीना से विधायक निर्मला सप्रे ने लोकसभा चुनाव के दौरान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के कार्यक्रम में मंच साझा किया और पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल रहीं।
याचिका में यह भी दावा किया गया कि वह भारतीय जनता पार्टी के साथ जुड़ चुकी हैं, लेकिन उन्होंने विधायक पद से इस्तीफा नहीं दिया। कांग्रेस ने इसे दल-बदल कानून का उल्लंघन बताते हुए उनकी सदस्यता समाप्त करने की मांग की थी।
निर्मला सप्रे ने क्या कहा था?
निर्मला सप्रे की ओर से अदालत में दायर जवाब में कहा गया कि उन्होंने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दिया है, लेकिन वह भारतीय जनता पार्टी में शामिल नहीं हुई हैं। उन्होंने अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों को निराधार बताया और कहा कि उन्हें बिना उचित आधार के इस मामले में शामिल किया जा रहा है। उन्होंने अदालत से याचिका खारिज करने की मांग की थी।
सरकार और विधानसभा अध्यक्ष का पक्ष
राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि विधानसभा अध्यक्ष इस मामले की सुनवाई कर रहे हैं और संबंधित पक्षों के बयान दर्ज किए जा चुके हैं। सरकार का कहना था कि विधानसभा का कार्यकाल अभी शेष है और ऐसी कोई असाधारण परिस्थिति नहीं है, जिसमें अदालत को स्पीकर को तत्काल फैसला देने का निर्देश देना पड़े। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।
अब आगे क्या होगा?
हाईकोर्ट के फैसले के बाद अब कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट का रुख करने की तैयारी में है। यदि सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर होती है, तो वहां इस बात पर सुनवाई हो सकती है कि दल-बदल कानून के मामलों में स्पीकर की कार्रवाई की समयसीमा और न्यायिक हस्तक्षेप का दायरा क्या होना चाहिए। फिलहाल मामला विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष लंबित है और अंतिम निर्णय का इंतजार किया जा रहा है।