MP में अब क्लर्क प्रमोशन से नहीं बन सकेंगे ADPO, हाई कोर्ट ने 10 परसेंट कोटा रद्द किया
कोर्ट ने यह भी कहा कि सिर्फ LLB की डिग्री होने से कोई व्यक्ति वकील नहीं बन जाता। इसके लिए कानून के तहत जरूरी प्रक्रिया और योग्यता पूरी करना भी जरूरी है।
MP News: मध्य प्रदेश में अभियोजन विभाग में नौकरी और प्रमोशन के नियमों को लेकर हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अब विभाग में क्लर्क के पद पर काम करने वाले कर्मचारी सीधे प्रमोशन पाकर सहायक जिला लोक अभियोजन अधिकारी (ADPO) नहीं बन सकेंगे। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने इस पद के लिए लागू 10 प्रतिशत विभागीय प्रमोशन कोटे को असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया है।
कोर्ट के इस फैसले के बाद ADPO के पदों पर नियुक्ति के लिए मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) की सीधी भर्ती प्रक्रिया ही लागू होगी। हालांकि, जिन कर्मचारियों को याचिका दायर होने से पहले इस कोटे के तहत प्रमोशन मिल चुका है, उनकी नौकरी पर फैसले का कोई असर नहीं पड़ेगा।
2002 में लागू हुआ था प्रमोशन का नियम
दरअसल, मध्य प्रदेश सरकार ने 14 अक्टूबर 2002 को लोक अभियोजन भर्ती नियमों में बदलाव किया था। इसके तहत ADPO के कुल पदों में से 10 प्रतिशत पद विभाग के ऐसे कर्मचारियों के लिए रखे गए थे, जो क्लर्क या सहायक ग्रेड-3 के पद पर काम कर रहे थे।
इस व्यवस्था का लाभ लेने के लिए कर्मचारियों के पास LLB की डिग्री और विभाग में कम से कम सात साल की नौकरी होना जरूरी था। बाकी 90 प्रतिशत पद MPPSC के जरिए सीधी भर्ती से भरे जाते थे। इस नियम को चुनौती देते हुए एडवोकेट रोहन शर्मा और अन्य लोगों ने हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर की थीं। उनका तर्क था कि क्लर्क और ADPO के काम की प्रकृति पूरी तरह अलग है। ऐसे में क्लर्कों को सीधे राजपत्रित अधिकारी के पद पर प्रमोशन देने की अलग व्यवस्था सही नहीं है।
कोर्ट ने क्यों रद्द किया 10 प्रतिशत कोटा?
जस्टिस जीएस अहलूवालिया और जस्टिस अनुराधा शुक्ला की डिवीजन बेंच ने मामले की सुनवाई के बाद माना कि क्लर्कों को सीधे ADPO बनाने के लिए बनाया गया नियम समानता के अधिकार के खिलाफ है। कोर्ट के मुताबिक, क्लर्क का मुख्य काम सरकारी दफ्तर में फाइलों और दस्तावेजों से जुड़ा होता है, जबकि ADPO को अदालत में सरकार की ओर से आपराधिक मामलों की पैरवी करनी होती है। उसे गवाहों से सवाल पूछने, सबूत पेश करने और कानूनी दलीलें रखने की जिम्मेदारी निभानी पड़ती है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि सिर्फ LLB की डिग्री होने से कोई व्यक्ति वकील नहीं बन जाता। इसके लिए कानून के तहत जरूरी प्रक्रिया और योग्यता पूरी करना भी जरूरी है।
पहले प्रमोशन पा चुके कर्मचारियों को राहत
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में पहले से ADPO बन चुके कर्मचारियों को राहत दी है। जिन कर्मचारियों को याचिका दायर होने से पहले इस कोटे के तहत प्रमोशन मिल चुका था, उनकी नियुक्ति को नहीं छेड़ा जाएगा। लेकिन अब इस नियम के आधार पर किसी नए कर्मचारी को ADPO नहीं बनाया जा सकेगा।
विभाग ने भी की थी कोटा खत्म करने की सिफारिश
सुनवाई के दौरान यह बात भी सामने आई कि अभियोजन विभाग ने 4 जुलाई 2019 को राज्य सरकार को पत्र लिखकर इस प्रमोशन व्यवस्था को खत्म करने की सिफारिश की थी। विभाग का कहना था कि क्लर्क से प्रमोशन पाकर ADPO बने कर्मचारियों को अदालत में पैरवी और कानूनी कामों में परेशानी हो रही थी।
ADPO भर्ती की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए क्या बदलेगा?
इस फैसले का सीधा फायदा उन युवाओं को मिल सकता है, जो MPPSC के जरिए ADPO बनने की तैयारी कर रहे हैं। अब विभागीय प्रमोशन के लिए रखे गए 10 प्रतिशत पद भी सीधी भर्ती की व्यवस्था के दायरे में आएंगे।
MPPSC ने वर्ष 2026 की ADPO भर्ती के लिए 107 पदों पर परीक्षा आयोजित करने की तैयारी की है। यह परीक्षा 1 नवंबर को प्रस्तावित है और इसके लिए 30 हजार से ज्यादा उम्मीदवारों ने आवेदन किया है। ऐसे में हाईकोर्ट का फैसला अभियोजन विभाग में भर्ती व्यवस्था के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।



