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Women Reservation Bill : 12 साल में पहली बार बिल पास कराने में नाकाम मोदी सरकार, पक्ष में मिले 298 वोट

Women Reservation Bill

Women Reservation Bill : नई दिल्ली। लोकसभा में मोदी सरकार को एक बड़ा झटका लगा है। पिछले 12 सालों में पहली बार ऐसा हुआ है जब सरकार कोई अहम विधेयक सदन में पास कराने में नाकाम रही। लोकसभा सीटों को बढ़ाने से जुड़े संविधान के 131वें संशोधन बिल पर हुई वोटिंग में सरकार के पक्ष में सिर्फ 298 वोट ही मिल पाए, जो आवश्यक दो-तिहाई बहुमत से काफी कम थे।

बता दें कि, इस बिल में लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों को बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव रखा गया था। लंबे समय तक चली चर्चा और वोटिंग के बाद यह विधेयक आवश्यक बहुमत हासिल नहीं कर सका।

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बिल पर 21 घंटे तक हुई चर्चा

सदन में इस बिल पर करीब 21 घंटे तक चर्चा हुई। इसके बाद हुई वोटिंग में कुल 528 सांसदों ने हिस्सा लिया। इनमें से 298 सांसदों ने बिल के पक्ष में और 230 सांसदों ने विरोध में वोट दिया। हालांकि, इस बिल को पारित करने के लिए दो-तिहाई बहुमत की जरूरत थी, जो कि 352 वोट होता है। इस तरह यह विधेयक 54 वोटों से गिर गया।

सीधा असर महिला आरक्षण पर

मोदी सरकार के 12 साल के कार्यकाल में यह पहला मौका है जब सरकार लोकसभा में कोई विधेयक पारित नहीं करा सकी। इसका सीधा असर महिला आरक्षण पर पड़ेगा। अब नई जनगणना के परिणाम आने से पहले महिला आरक्षण लागू नहीं हो पाएगा, जिससे 2029 के लोकसभा चुनाव में महिलाओं को इसका लाभ नहीं मिल सकेगा।

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ये दोनों विधेयक पहले बिल से जुड़े

सरकार ने इस दौरान दो अन्य विधेयकों को वोटिंग के लिए पेश ही नहीं किया। इनमें परिसीमन संशोधन संविधान बिल 2026 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) बिल 2026 शामिल हैं। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि ये दोनों विधेयक पहले बिल से जुड़े हुए हैं, इसलिए इन पर अलग से वोटिंग की जरूरत नहीं है।

तीन महत्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा के लिए विशेष सत्र

सरकार ने संसद का विशेष सत्र तीन महत्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा के लिए बुलाया था। इनमें 131वां संविधान संशोधन विधेयक, परिसीमन संशोधन विधेयक और केंद्र शासित प्रदेश कानून संशोधन विधेयक शामिल थे। 131वें संशोधन में राज्यों से 815 और केंद्र शासित प्रदेशों से 35 सीटें प्रस्तावित की गई थीं।

बिल पास कराने के लिए 352 वोटों की जरूरत

वोटिंग के आंकड़ों पर नजर डालें तो एनडीए के पास 293 सांसद थे और उसे बिल पास कराने के लिए 352 वोटों की जरूरत थी। सरकार केवल 5 अतिरिक्त सांसदों का समर्थन जुटा पाई और विपक्ष को अपने पक्ष में करने में सफल नहीं हो सकी। यही वजह रही कि बिल पारित नहीं हो पाया।

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पिछले 24 वर्षों में पहला मौका

यह पिछले 24 वर्षों में पहला मौका है जब संसद में कोई सरकारी विधेयक गिरा है। इससे पहले 2002 में आतंकवाद निरोधक कानून (पोटा) संसद में पारित नहीं हो पाया था। वहीं, 1990 के बाद यह पहला संविधान संशोधन विधेयक है जो लोकसभा में गिरा है।

महिला आरक्षण और परिसीमन कनेक्टेड

महिला आरक्षण और परिसीमन का आपस में गहरा संबंध है। महिला आरक्षण कानून के तहत लोकसभा और विधानसभा की 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जानी हैं, लेकिन इसके लिए परिसीमन जरूरी है।

परिसीमन के तहत जनसंख्या के आधार पर सीटों की संख्या और सीमाएं तय की जाती हैं। अब यह प्रक्रिया नई जनगणना के बाद ही आगे बढ़ सकेगी, जिससे महिला आरक्षण का लाभ 2034 के लोकसभा चुनाव तक ही मिल पाएगा।

अगर यह बिल पास हो जाता, तो सभी राज्यों की लोकसभा सीटें करीब 50 प्रतिशत तक बढ़ जातीं। उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश में 80 सीटों की संख्या बढ़कर 120 हो जाती और इनमें से 40 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होतीं।

विधेयक में बदलाव कर दोबारा पेश

अब सरकार के सामने विकल्प है कि वह इस विधेयक में बदलाव कर दोबारा पेश करे या विपक्ष के सुझावों के साथ सहमति बनाने की कोशिश करे। वहीं, विपक्ष का कहना है कि परिसीमन से दक्षिणी राज्यों की राजनीतिक ताकत कम हो सकती है और यह ओबीसी तथा एससी-एसटी वर्गों के हितों के खिलाफ है।

संसद में इस मुद्दे पर तीखी बहस देखने को मिली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्ष से समर्थन की अपील करते हुए कहा कि उन्हें इस बिल का श्रेय नहीं चाहिए। वहीं, विपक्षी नेताओं ने सरकार पर राजनीतिक लाभ के लिए इस बिल को लाने का आरोप लगाया।

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परिसीमन के बाद भी 24% सांसद दक्षिण से

  • कर्नाटक की अभी 28 सीटें हैं, जो कुल 543 सीटों में से 5.15% है। परिसीमन के बाद कर्नाटक की 42 सीटें होंगी, जो कुल 816 सीटों में से 5.14% होगी।
  • आंध्र प्रदेश की अभी 25 सीटें हैं, जो कुल 543 सीटों में से 4.60% है।
    परिसीमन के बाद आंध्र प्रदेश की 38 सीटें होंगी, जो कुल 816 सीटों में से 4.65% होगी।
  • तेलंगाना की अभी 17 सीटें हैं, जो कुल 543 सीटों में से 3.13% है। परिसीमन के बाद तेलंगाना की 26 सीटें होंगी, जो कुल 816 सीटों में से 3.18% होगी।
  • तमिलनाडु की अभी 39 सीटें हैं, जो कुल 543 सीटों में से 7.18% है। परिसीमन के बाद तमिलनाडु की 59 सीटें होंगी, जो कुल 816 सीटों में से 7.23% होगी।
  • केरल की अभी 20 सीटें हैं, जो कुल 543 सीटों में से 3.68% है। परिसीमन के बाद केरल की 30 सीटें होंगी, जो कुल 816 सीटों में से 3.67% होगी।
  • कुल मिलाकर दक्षिण के इन राज्यों की अभी 129 सीटें हैं, जो कुल 543 सीटों में से 24% है। परिसीमन के बाद इनकी 195 सीटें होंगी, जो कुल 816 सीटों में से भी 24% ही रहेगी।

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महिला आरक्षण बिल की टाइमलाइन

1996: यूनाइटेड फ्रंट की देवगौड़ा सरकार विधेयक लेकर आई। सरकार को समर्थन देने वाली कई पार्टियों ने विरोध किया। स्टैंडिंग कमेटी को भेजा गया।
1998: 13 जुलाई को अटल की एनडीए सरकार ने लोकसभा में बिल पेश करने की कोशिश की, लेकिन RJD सांसद सुरेंद्र प्रसाद यादव ने बिल की कॉपी फाड़ दी।
1998: 14 जुलाई को सरकार ने लोकसभा में दोबारा पेश करने की कोशिश की, लेकिन हंगामे और विरोध की वजह से पेश नहीं हो सका।
1998: 11 दिसंबर को लोकसभा में बिल पेश करने की कोशिश हुई, लेकिन सपा सांसद दरोगा प्रसाद स्पीकर पोडियम तक पहुंच गए।
1998: 23 दिसंबर को अटल सरकार बिल पेश करने में कामयाब रही। हालांकि JDU ने विरोध कर दिया और पारित नहीं हो सका।
2000: अटल सरकार ने पेश करने की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली।
2002: अटल सरकार ने पेश करने की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली।
2003: जुलाई में बीजेपी नेता मुरली मनोहर जोशी ने सर्वदलीय बैठक में आम सहमति बनाने की कोशिश की, लेकिन असफल रहे।
2008: मनमोहन सरकार ने 6 मई को राज्यसभा में विधेयक पेश किया। खूब हंगामा हुआ। स्टैंडिंग कमेटी को भेजा गया।
2010: 9 मार्च को राज्यसभा में विधेयक पेश किया गया और दो तिहाई बहुमत से पारित हो गया। लेकिन लोकसभा में पेश नहीं हो पाया। बिल लैप्स हो गया।
2023: मोदी सरकार ने ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के रूप में विधेयक संसद में पेश किया। लोकसभा और राज्यसभा दोनों में पारित हुआ। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी के बाद यह कानून बना (106वां संविधान संशोधन)।

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