Dollar Vs Rupees : नई दिल्ली। भारतीय रुपया शुक्रवार 15 मई को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 30 पैसे टूटकर 95.94 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। इससे पहले गुरुवार को रुपया 95.64 के ऑल टाइम लो स्तर पर बंद हुआ था। लगातार गिरते रुपए ने देश की आर्थिक स्थिति और महंगाई को लेकर चिंता बढ़ा दी है। साल 2026 की शुरुआत से ही रुपया दबाव में बना हुआ है और विशेषज्ञों का मानना है कि अगर वैश्विक हालात नहीं सुधरे तो डॉलर जल्द ही 100 रुपए के स्तर तक पहुंच सकता है।
मिडिल ईस्ट तनाव से बढ़ा आर्थिक दबाव
अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर वैश्विक बाजारों पर साफ दिखाई दे रहा है। खासकर होर्मुज स्ट्रेट के जरिए तेल सप्लाई बाधित होने की आशंका ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। युद्ध जैसे हालात में निवेशक सुरक्षित विकल्प के रूप में डॉलर की ओर रुख कर रहे हैं। इसका सीधा असर भारतीय रुपए समेत कई एशियाई मुद्राओं पर पड़ा है। बाजार में डॉलर की मांग बढ़ने से रुपया लगातार कमजोर हो रहा है।
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कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें बनी बड़ी वजह
भारत अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। ब्रेंट क्रूड की कीमत 107 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी है।
तेल खरीदने के लिए भारत को ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ रहे हैं, जिससे रुपए पर अतिरिक्त दबाव बढ़ गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर तेल की कीमतें इसी तरह ऊंची बनी रहीं तो आने वाले समय में पेट्रोल-डीजल और अन्य जरूरी वस्तुएं और महंगी हो सकती हैं।
डॉलर इंडेक्स मजबूत होने से एशियाई मुद्राओं पर असर
दुनिया की छह प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले डॉलर की मजबूती को मापने वाला डॉलर इंडेक्स 99.05 के स्तर पर पहुंच गया है। डॉलर इंडेक्स मजबूत होने का मतलब है कि वैश्विक बाजार में डॉलर की मांग बढ़ रही है। जब डॉलर मजबूत होता है, तब भारतीय रुपया समेत अन्य एशियाई मुद्राएं कमजोर हो जाती हैं। यही वजह है कि पिछले कुछ दिनों से रुपए में लगातार गिरावट देखी जा रही है।
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विदेशी निवेशकों की बिकवाली से बाजार दबाव में
विदेशी संस्थागत निवेशक यानी FII लगातार भारतीय शेयर बाजार से पैसा निकाल रहे हैं। केवल बुधवार को विदेशी निवेशकों ने 4,700 करोड़ रुपए से ज्यादा के शेयर बेच दिए। विदेशी निवेशकों की बिकवाली के कारण डॉलर बाहर जा रहा है और भारतीय मुद्रा कमजोर हो रही है। इससे शेयर बाजार और निवेशकों का भरोसा भी प्रभावित हो रहा है।
महंगाई बढ़ने का खतरा गहराया
कमजोर रुपया आम लोगों की जिंदगी पर सीधा असर डाल सकता है। डॉलर महंगा होने से पेट्रोल-डीजल, LPG, प्लास्टिक और अन्य पेट्रोकेमिकल उत्पादों की कीमतें बढ़ सकती हैं। इसके अलावा मोबाइल, लैपटॉप और आयातित इलेक्ट्रॉनिक सामान भी महंगे हो सकते हैं। विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों और यात्रा की योजना बना रहे लोगों को अब ज्यादा रुपए खर्च करने होंगे।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति “इंपोर्टेड इन्फ्लेशन” को बढ़ा सकती है, यानी विदेशों से आने वाले सामान की कीमतें बढ़ने से देश में महंगाई और तेज हो सकती है। भारत की थोक महंगाई दर पहले ही साढ़े तीन साल के उच्च स्तर पर पहुंच चुकी है।
तेल उत्पादन में गिरावट से बढ़ी चिंता
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल महीने में OPEC देशों का तेल उत्पादन पिछले दो दशकों के सबसे निचले स्तर पर रहा। सऊदी अरामको के CEO अमीन नासिर ने चेतावनी दी है कि होर्मुज स्ट्रेट में बाधा आने से वैश्विक तेल बाजार को सामान्य होने में 2027 तक का समय लग सकता है। इससे हर हफ्ते करीब 10 करोड़ बैरल तेल का नुकसान हो रहा है।
जेपी मॉर्गन की रिपोर्ट के अनुसार, अगर आने वाले महीनों में होर्मुज रूट फिर से सामान्य भी हो जाता है, तब भी तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी रह सकती हैं। इसका असर भारत जैसे आयात पर निर्भर देशों पर लंबे समय तक पड़ सकता है।
सरकार ने शुरू किए बचाव के कदम
रुपए में लगातार गिरावट को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में देशवासियों से आर्थिक अनुशासन बनाए रखने और फिजूलखर्ची कम करने की अपील की थी। सरकार ने विदेशी मुद्रा भंडार बचाने के लिए कीमती धातुओं के आयात पर टैरिफ भी बढ़ा दिया है। सरकार की कोशिश है कि डॉलर की मांग को नियंत्रित किया जाए और रुपए पर दबाव कम हो।
कैसे तय होती है करेंसी की कीमत
किसी भी देश की मुद्रा की कीमत उसकी मांग और आपूर्ति पर निर्भर करती है। जब किसी देश के पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार होता है, तब उसकी मुद्रा मजबूत रहती है। अगर डॉलर की मांग ज्यादा और उपलब्धता कम हो जाए तो रुपया कमजोर हो जाता है। भारत के फॉरेन रिजर्व और वैश्विक बाजार की स्थिति का असर सीधे रुपए की कीमत पर पड़ता है।