MP DAP Consumption : भोपाल। मध्य प्रदेश में रासायनिक उर्वरकों, खासकर डीएपी (डाय-अमोनियम फॉस्फेट) के बढ़ते और असंतुलित उपयोग को लेकर कृषि मंत्रालय की वर्ष 2025-26 की रिपोर्ट ने नई चिंता पैदा कर दी है। रिपोर्ट के अनुसार, देश में डीएपी की सबसे अधिक खपत वाले शीर्ष 100 जिलों में मध्य प्रदेश के 11 जिले शामिल हैं। इस मामले में राज्य दूसरे स्थान पर है, जबकि उत्तर प्रदेश पहले स्थान पर है।
विशेषज्ञों का कहना है कि उर्वरकों का असंतुलित उपयोग मिट्टी की गुणवत्ता और खेती की दीर्घकालीन उत्पादकता को प्रभावित कर सकता है। हालांकि, यह कहना कि राज्य की सभी सब्जियां या खाद्य उत्पाद “जहरीले” हो गए हैं, उपलब्ध रिपोर्ट से सीधे तौर पर साबित नहीं होता। विशेषज्ञों ने संतुलित उर्वरक उपयोग और वैज्ञानिक खेती पर जोर दिया है।
मिट्टी की उर्वरता पर बढ़ रहा दबाव
रिपोर्ट के मुताबिक, कई जिलों में डीएपी और यूरिया का जरूरत से ज्यादा उपयोग किया जा रहा है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, लगातार अधिक मात्रा में रासायनिक उर्वरकों के इस्तेमाल से मिट्टी में फॉस्फोरस का असंतुलन बढ़ सकता है। इसके साथ ही जिंक, आयरन और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपलब्धता घटने लगती है।
इसका असर मिट्टी की उर्वरक क्षमता और फसल की गुणवत्ता दोनों पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते संतुलित उर्वरक उपयोग की दिशा में कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में कृषि उत्पादन पर भी इसका असर देखने को मिल सकता है।
91 प्रतिशत किसानों को नहीं मिली पर्याप्त जानकारी
सर्वेक्षण में यह भी सामने आया कि किसानों के बीच उर्वरकों के वैज्ञानिक और संतुलित उपयोग को लेकर पर्याप्त जागरूकता नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार, 91 प्रतिशत किसानों ने बताया कि उन्हें कृषि विभाग की ओर से उर्वरकों के सही उपयोग का प्रशिक्षण या सलाह नहीं मिली।
वहीं, 76 प्रतिशत किसानों का कहना है कि उन्हें कृषि अधिकारियों, खाद विक्रेताओं या अन्य माध्यमों से भी पर्याप्त मार्गदर्शन नहीं मिला। विशेषज्ञों का मानना है कि जागरूकता की कमी के कारण किसान जरूरत से अधिक डीएपी का उपयोग कर रहे हैं।
इन जिलों में सबसे अधिक DAP की खपत
रिपोर्ट के अनुसार, नर्मदा घाटी और उससे जुड़े जिलों में डीएपी की खपत सबसे अधिक दर्ज की गई है। प्रदेश में नर्मदापुरम पहले स्थान पर है, जहां एक वर्ष में 48,527 मीट्रिक टन डीएपी की बिक्री हुई। इसके बाद सीहोर (45,249 मीट्रिक टन), रायसेन (43,965 मीट्रिक टन), विदिशा (39,104 मीट्रिक टन) और उज्जैन (36,995 मीट्रिक टन) का स्थान है।
इसके अलावा देवास, राजगढ़, जबलपुर, ग्वालियर और धार भी अधिक खपत वाले जिलों में शामिल हैं। यह आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश के कई कृषि प्रधान क्षेत्रों में डीएपी पर निर्भरता लगातार बढ़ रही है।
किन फसलों में सबसे अधिक उपयोग हो रहा है?
विशेषज्ञों के अनुसार, जिन जिलों में डीएपी की खपत अधिक है, वहां धान, गेहूं, सोयाबीन और ग्रीष्मकालीन मूंग जैसी प्रमुख फसलों की खेती बड़े पैमाने पर होती है। इन फसलों में डीएपी को बेसल डोज के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
इसके अलावा जिंक सल्फेट, अमोनियम सल्फेट और अन्य रासायनिक उर्वरकों का भी व्यापक उपयोग किया जा रहा है। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि उर्वरकों का उपयोग मिट्टी परीक्षण की रिपोर्ट के आधार पर किया जाना चाहिए, ताकि फसल उत्पादन और मिट्टी दोनों सुरक्षित रह सकें।
कृषि विभाग चलाएगा जागरूकता अभियान
कृषि संचालनालय ने कहा है कि किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग के प्रति जागरूक करने के लिए विशेष अभियान चलाया जाएगा। विभाग का लक्ष्य डीएपी पर अत्यधिक निर्भरता कम करना और एनपीके कॉम्प्लेक्स सहित अन्य संतुलित उर्वरकों के उपयोग को बढ़ावा देना है।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि वैज्ञानिक खेती, नियमित मिट्टी परीक्षण और सही मात्रा में उर्वरकों के उपयोग से मिट्टी की सेहत को लंबे समय तक बेहतर बनाए रखा जा सकता है।
विशेषज्ञों ने दी संतुलित खेती की सलाह
पर्यावरण और कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि उर्वरकों का संतुलित उपयोग नहीं किया गया तो भविष्य में मिट्टी की गुणवत्ता, फसल की उत्पादकता और कृषि की स्थिरता पर गंभीर असर पड़ सकता है।
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उनका सुझाव है कि किसान मिट्टी परीक्षण के आधार पर ही उर्वरकों का इस्तेमाल करें और जैविक तथा संतुलित खेती की ओर भी ध्यान दें। इससे खेती की लागत कम होने के साथ-साथ मिट्टी की सेहत भी बेहतर बनी रहेगी।