RSS Registration Row : भोपाल। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के पंजीयन को लेकर छिड़ी सियासी बहस अब मध्य प्रदेश तक पहुंच गई है। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत को पत्र लिखकर RSS के रजिस्ट्रेशन, वित्तीय पारदर्शिता, आय-व्यय और कानूनी स्थिति पर सवाल उठाए हैं। वहीं RSS से जुड़े पक्ष का कहना है कि संगठन के लिए पंजीयन कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है और इसकी वैधता को अदालतें पहले भी स्वीकार कर चुकी हैं।
प्रियंक खड़गे के बयान के बाद गरमाया मुद्दा
कर्नाटक के मंत्री प्रियंक खड़गे द्वारा RSS के बिना रजिस्ट्रेशन काम करने पर सवाल उठाए जाने के बाद यह मुद्दा फिर चर्चा में आ गया। दिग्विजय सिंह ने भी इसी बहस के बीच मोहन भागवत को पत्र लिखकर संगठन की जवाबदेही और वित्तीय पारदर्शिता पर सवाल खड़े किए हैं।
दिग्विजय सिंह ने क्या उठाए सवाल?
दिग्विजय सिंह ने अपने पत्र में कहा है कि लोकतंत्र में कोई भी संस्था जवाबदेही से ऊपर नहीं हो सकती। उन्होंने RSS के पंजीयन, वित्तीय स्रोतों और कर अनुपालन की जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की है।
उन्होंने दिल्ली में बने RSS के नए कार्यालय का जिक्र करते हुए पूछा कि करीब 250 करोड़ रुपये की लागत वाले भवन के लिए धन कहां से आया। साथ ही कोविड काल में हुए खर्च और संगठन के आय-व्यय का ब्यौरा सार्वजनिक करने की मांग भी की।
RSS और सनातन धर्म की तुलना पर भी आपत्ति
पत्र में दिग्विजय सिंह ने कहा कि RSS और सनातन धर्म की तुलना उचित नहीं है। उनका कहना है कि सनातन धर्म हजारों वर्षों पुरानी आस्था है, जबकि RSS एक संगठन है और दोनों को समान बताना सही नहीं माना जा सकता।
क्या किसी संगठन का रजिस्ट्रेशन जरूरी है?
मामले में सामने आई कानूनी जानकारी के अनुसार भारत में ऐसा कोई सामान्य कानून नहीं है जो हर संगठन के लिए रजिस्ट्रेशन अनिवार्य बनाता हो। सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट, ट्रस्ट एक्ट या अन्य कानूनी प्रावधानों के तहत संगठन स्वेच्छा से पंजीयन करा सकते हैं।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार रजिस्ट्रेशन आमतौर पर तब आवश्यक होता है जब किसी संस्था को विशेष कानूनी अधिकार, संपत्ति स्वामित्व या अन्य वैधानिक सुविधाओं की जरूरत हो।
RSS का पक्ष क्या है?
RSS से जुड़े जानकारों का कहना है कि संगठन 1925 से एक सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन के रूप में कार्य कर रहा है। संगठन की कोई औपचारिक सदस्यता प्रणाली या सदस्यता कार्ड नहीं है। स्वयंसेवक शाखाओं और गतिविधियों के माध्यम से जुड़ते हैं।
RSS का यह भी तर्क है कि उसके अधिकांश सहयोगी संगठन, ट्रस्ट और संस्थाएं अलग-अलग पंजीकृत हैं, उनका ऑडिट होता है और वे कानूनी प्रावधानों का पालन करते हैं।
अदालतों में भी उठ चुका है मुद्दा
RSS की कानूनी स्थिति को लेकर अतीत में भी सवाल उठे थे। 1970 के दशक में कर संबंधी मामलों के दौरान इसकी वैधता पर चर्चा हुई थी। बाद में न्यायिक फैसलों में RSS को व्यक्तियों के संगठन के रूप में मान्यता मिलने का उल्लेख किया गया।
जवाब का इंतजार
दिग्विजय सिंह ने दावा किया है कि उन्होंने पहले भी इस विषय पर पत्राचार किया था, लेकिन अब तक जवाब नहीं मिला। फिलहाल RSS के रजिस्ट्रेशन, फंडिंग और जवाबदेही को लेकर सियासी बहस तेज हो गई है, जबकि संगठन अपने पुराने रुख पर कायम है कि उसका कार्य संचालन मौजूदा कानूनी ढांचे के अनुरूप है।
यहां देखिये RSS रजिस्ट्रेशन विवाद पर दिग्विजय सिंह के लेटर