Saurabh Sharma Bail: 108 करोड़ के मनी लॉन्ड्रिंग केस में सौरभ शर्मा को हाई कोर्ट से जमानत, 10 लाख के मुचलके पर रिहाई
चर्चित 108 करोड़ रुपये के कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में पूर्व RTO कांस्टेबल सौरभ शर्मा को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। अदालत ने 10 लाख रुपये के निजी मुचलके पर नियमित जमानत मंजूर की। जानिए कोर्ट ने किन आधारों पर यह फैसला सुनाया और मामले में आगे क्या होगा।
भोपाल। 108 करोड़ रुपये के कथित मनी लॉन्ड्रिंग और आय से अधिक संपत्ति वाले मामले में RTO के पूर्व कांस्टेबल सौरभ शर्मा को आखिरकार बड़ी राहत मिली है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की जबलपुर पीठ ने उन्हें नियमित जमानत दे दी, ऐसा कहा गया। अदालत ने उन्हें 10 लाख रुपये के निजी मुचलके यानी पर्सनल बांड पर रिहा करने का आदेश दिया है। हालांकि इससे पहले जिला अदालत और हाई कोर्ट, दोनों जगह उनकी जमानत वाली याचिकाएं खारिज हो चुकी थीं , और ये बात भी चर्चा में रही।
हाई कोर्ट ने किन तरह के आधारों पर दी राहत?
जबलपुर हाई कोर्ट की जस्टिस अजय कुमार निरंकारी की एकल पीठ ने पूरे मामले पर सुनवाई के बाद 31 जुलाई को फैसला सुरक्षित रख लिया था। फिर 4 अगस्त को आदेश जारी किया गया। अदालत ने नियमित जमानत देने के पीछे कई बातें गिनाईं, जिनमें जांच पूरी हो जाने, आरोप तय हो जाने और ट्रायल के जल्दी पूरे होने की संभावना कम होना—इसी को मुख्य आधार माना गया।
पहले कई बार खारिज होती रही थी उनकी मांग
सौरभ शर्मा ने नियमित जमानत के लिए पहले जिला अदालत और बाद में हाई कोर्ट का रुख किया था, मगर वहां से उन्हें राहत नहीं मिली। उन्होंने पत्नी की बीमारी का हवाला देकर अंतरिम जमानत की भी मांग रखी थी , लेकिन उस समय अदालत ने इसे स्वीकार नहीं किया था। अब परिस्थितियां बदली हुई बताई गईं, और इसी वजह से हाई कोर्ट ने उन्हें नियमित जमानत प्रदान कर दी।
मामला अचानक क्यों सुर्खियों में आया था?
ये मामला उस वक्त सुर्खियों में आया जब जांच एजेंसियों ने कार्रवाई के दौरान सौरभ शर्मा के पास से करीब 52 किलोग्राम सोना और लगभग 11 करोड़ रुपये नकद मिलने का दावा किया था। इसके बाद मामला कथित 108 करोड़ रुपये की मनी लॉन्ड्रिंग और आय से ज्यादा संपत्ति के आरोपों के दायरे में आ गया, और तब से ये प्रदेश के सबसे चर्चित मामलों में गिना जाने लगा।
आदेश में अदालत ने क्या स्पष्ट किया?
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में साफ तौर पर कहा कि जमानत दिए जाने का मतलब किसी के अंतिम गुण-दोष पर राय बनाना नहीं है। अदालत का रुख यह भी रहा कि यह फैसला सिर्फ मौजूदा कानूनी हालात और जांच की स्थिति को देखते हुए किया गया है। मामले की सुनवाई ट्रायल कोर्ट में कानून के अनुसार आगे बढ़ती रहेगी, और अंतिम निर्णय, उपलब्ध साक्ष्यों और दलीलों के आधार पर होगा।
