MP Lynching Case : जबलपुर। मध्य प्रदेश के चर्चित लिंचिंग मामले में दोषियों को सजा सुनाने के बाद संबंधित सत्र न्यायाधीश को कथित धमकियां मिलने का मामला सामने आया है। इस घटनाक्रम पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने राज्य पुलिस और गृह विभाग को न्यायाधीश की सुरक्षा बढ़ाने, धमकी देने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने और पूरे मामले में उठाए गए कदमों की विस्तृत जानकारी अदालत के समक्ष प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।
हाईकोर्ट ने कहा- न्यायिक स्वतंत्रता से समझौता नहीं होगा
मीडिया रिपोर्टों के आधार पर मामले का संज्ञान लेते हुए न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल और न्यायमूर्ति अवनिंद्र कुमार सिंह की खंडपीठ ने कहा कि इस प्रकार की घटनाएं न्यायिक स्वतंत्रता और न्यायिक अधिकारियों के निर्भीक कार्य निष्पादन में बाधा उत्पन्न करती हैं।
अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी न्यायिक अधिकारी को केवल इसलिए धमकाया नहीं जा सकता क्योंकि उसका फैसला समाज के किसी वर्ग को पसंद नहीं आया। हाईकोर्ट ने पुलिस महानिदेशक (DGP), अतिरिक्त मुख्य सचिव/प्रधान सचिव (गृह) और नर्मदापुरम के पुलिस अधीक्षक से मामले में अब तक की गई कार्रवाई पर जवाब मांगा है।
सुरक्षा बढ़ाने और FIR दर्ज करने के निर्देश
हाईकोर्ट ने संबंधित न्यायाधीश को पुलिस सुरक्षा उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं। साथ ही यह भी कहा है कि सोशल मीडिया या अन्य माध्यमों से धमकी देने वाले व्यक्तियों के खिलाफ कानून के अनुसार मामला दर्ज कर आवश्यक कार्रवाई की जाए।
अदालत ने अधिकारियों से यह भी पूछा है कि धमकी भरे संदेशों और पोस्ट के संबंध में अब तक क्या कदम उठाए गए हैं और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या व्यवस्था की जा रही है।
क्या है पूरा लिंचिंग मामला
यह मामला अगस्त 2022 का है। आरोपों के अनुसार, नर्मदापुरम जिले में शेख लाला नाजिर अहमद की भीड़ द्वारा कथित रूप से पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी। उन पर गो-तस्करी का आरोप लगाया गया था। मामले की सुनवाई के बाद अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश तबस्सुम खान ने 12 जून को सात आरोपियों को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
अदालत ने अपने निर्णय में कहा था कि मृतक पर अत्यंत क्रूर तरीके से हमला किया गया था। फैसले के बाद सोशल मीडिया पर न्यायाधीश के खिलाफ कथित आपत्तिजनक टिप्पणियां और धमकी भरे संदेश सामने आने लगे, जिसके बाद हाईकोर्ट ने मामले का संज्ञान लिया।
न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा पर विशेष जोर
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि न्यायिक अधिकारियों को निष्पक्ष और निर्भीक वातावरण में न्यायिक कार्य करने का अधिकार है। यदि किसी न्यायाधीश को उनके न्यायिक आदेश के कारण धमकाने या प्रभावित करने का प्रयास किया जाता है, तो यह न्याय व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है। अदालत ने संकेत दिया कि ऐसे मामलों में कानून के अनुसार सख्त कार्रवाई की जाएगी ताकि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और लोगों का न्याय व्यवस्था पर विश्वास कायम रहे।