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MP Infant Mortality Rate : MP में बाल स्वास्थ्य सुविधाओं पर उठे सवाल! जन्म के 28 दिनों के भीतर ही दम तोड़ रहे मासूम

MP Infant Mortality Rate

MP Infant Mortality Rate : भोपाल। एक मां नौ महीने तक जिस बच्चे को अपनी कोख में पालती है, उसके जन्म लेते ही मानों दुनिया की सारी खुशियां आंगन में उतर आती हैं। मां की ममता भरी थपकी और लोरियों की आवाज को अभी मासूम पहचानना शुरू ही करता है कि अचानक वह एक ऐसी गहरी नींद में सो जाता है, जिससे फिर कभी नहीं उठता। यह मध्य प्रदेश की उन माताओं की सिसकती हुई हकीकत है, जिनकी गोद जन्म के महज 28 दिनों के भीतर ही सूनी हो जा रही है।

जनगणना निदेशालय की सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआरएस) की हालिया रिपोर्ट ने मध्य प्रदेश में शिशु स्वास्थ्य और चिकित्सा व्यवस्थाओं की कलई खोलकर रख दी है। आंकड़ों से ज्यादा विचलित करने वाली बात इन मासूमों की मौत के पीछे छिपी वजहें हैं, जो सीधे तौर पर सिस्टम की नाकामी की ओर इशारा करती हैं।

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डरावने आंकड़े: हर साल 52 हजार मासूमों की मौत

एसआरएस की रिपोर्ट के मुताबिक, छत्तीसगढ़ के बाद मध्य प्रदेश देश में दूसरा ऐसा राज्य है जहां शिशु मृत्यु दर सबसे बदतर स्थिति में है। प्रदेश में हर साल लगभग 20 लाख बच्चे जन्म लेते हैं, लेकिन बेहद अफसोस की बात है कि इनमें से 52 हजार नवजात अपने जीवन के 28 दिन भी पूरे नहीं कर पाते और दम तोड़ देते हैं।

इसके अलावा, प्रति एक हजार बच्चों में से 41 बच्चे ऐसे हैं जो कुपोषण, समय पर टीकाकरण न होने और कमजोर इम्युनिटी के कारण 5 साल की उम्र तक भी नहीं पहुंच पाते।

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मौत की वजह नंबर 1: सरकारी अस्पतालों में सीजर डिलीवरी का अकाल

पड़ताल में सामने आया है कि नवजातों की मौत की एक बहुत बड़ी वजह प्रसव के दौरान होने वाली गंभीर जटिलताएं हैं। पूरे मध्य प्रदेश में महज 140 सरकारी अस्पताल ऐसे हैं, जहां सीजेरियन (सीजर) डिलीवरी की सुविधा उपलब्ध है।

अस्पतालों में स्त्री रोग विशेषज्ञों, शिशु रोग विशेषज्ञों और एनेस्थीसिया (बेहोशी के डॉक्टर) विशेषज्ञों की भारी किल्लत है। जब ऐन वक्त पर प्रसूता की हालत बिगड़ती है, तो उसे दूसरे बड़े अस्पताल के लिए रेफर कर दिया जाता है। इस भागदौड़ और दूरी को तय करने के चक्कर में कई बार मां और बच्चे दोनों की सांसें रास्ते में ही थम जाती हैं।

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मौत की वजह नंबर 2: गर्भावस्था में लापरवाही और पोषण का अभाव

विशेषज्ञों के अनुसार, शिशु मृत्यु दर बढ़ने का एक मुख्य कारण गर्भावस्था के दौरान सही ढंग से देखभाल न होना भी है। गर्भ में पल रहे शिशु को सारा पोषण मां के भोजन से ही मिलता है।

जागरूकता की कमी या गरीबी के कारण कई गर्भवती महिलाएं जरूरी पौष्टिक आहार और डॉक्टरों द्वारा बताई गई दवाइयां (जैसे आयरन और फॉलिक एसिड) नहीं ले पाती हैं। शरीर में खून और पोषक तत्वों की भारी कमी के कारण बच्चे गर्भ में ही कमजोर हो जाते हैं, जो जन्म के बाद उनकी मौत का कारण बनता है।

व्यवस्था पर सुलगते सवाल

देश का दिल कहे जाने वाले मध्य प्रदेश में आज भी एक छोटी सी चिकित्सकीय लापरवाही या डॉक्टरों की कमी किसी मासूम की जान पर भारी पड़ रही है। सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच का यह फासला हर साल हजारों मांओं को उम्रभर का कभी न भरने वाला दर्द दे रहा है। विज्ञापन और दावों की चमक के पीछे अस्पतालों की यह बदहाली और नौनिहालों की चीखें व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े करती हैं।

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