Counting Supervisor Dispute : नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें केंद्र सरकार और सार्वजनिक उपक्रम (PSU) के कर्मचारियों को काउंटिंग सुपरवाइजर नियुक्त करने के फैसले पर आपत्ति जताई गई थी। अदालत ने शनिवार को साफ कर दिया कि इस मामले में कोई नया आदेश जारी करने की आवश्यकता नहीं है और पहले से लागू नियम ही प्रभावी रहेंगे।
विशेष बेंच की टिप्पणी
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की विशेष बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि 13 अप्रैल 2026 को चुनाव आयोग द्वारा जारी किया गया सर्कुलर ही लागू रहेगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अलग से किसी तरह के हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है, क्योंकि मौजूदा व्यवस्था पर्याप्त और वैध है।
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क्या है पूरा मामला
दरअसल, तृणमूल कांग्रेस ने कलकत्ता हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें यह कहा गया था कि केवल केंद्र सरकार और PSU कर्मचारियों को ही काउंटिंग सुपरवाइजर बनाया जाना सही है। पार्टी का मानना था कि इस निर्णय से निष्पक्षता पर सवाल उठ सकते हैं, इसलिए इसमें बदलाव जरूरी है।
हाईकोर्ट का रुख
कलकत्ता हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि काउंटिंग स्टाफ की नियुक्ति पूरी तरह से चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में आती है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस प्रक्रिया में कोई अवैधता नहीं पाई गई है।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि केंद्रीय कर्मचारियों पर राजनीतिक प्रभाव के आरोप केवल आशंकाओं पर आधारित हैं, जिनके समर्थन में कोई ठोस सबूत नहीं दिए गए। अगर किसी पक्ष को इस पर आपत्ति है, तो वह चुनाव याचिका के माध्यम से इसे चुनौती दे सकता है।
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क्या है इस फैसले का महत्व?
सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से यह साफ हो गया है कि चुनाव आयोग को अपने अधिकारों के तहत स्वतंत्र रूप से काम करने की पूरी छूट है। साथ ही, अदालत ने यह भी संकेत दिया कि बिना ठोस प्रमाण के लगाए गए आरोपों को कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती। यह फैसला चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और संस्थाओं की स्वायत्तता को मजबूत करने वाला माना जा रहा है।