SC on Sabarimala Case : नई दिल्ली। धार्मिक स्थलों में महिलाओं के साथ भेदभाव से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को दूसरे दिन भी सुनवाई जारी रही। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में कहा कि कोई भी धर्मनिरपेक्ष अदालत किसी धार्मिक प्रथा को केवल अंधविश्वास नहीं कह सकती, क्योंकि अदालत के पास ऐसा तय करने की विशेषज्ञता नहीं होती।
विविध समाज में एक ही प्रथा अलग-अलग
मेहता ने दलील दी कि भारत जैसे विविध समाज में एक ही प्रथा अलग-अलग समुदायों के लिए अलग मायने रख सकती है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जो चीज नगालैंड के किसी समुदाय के लिए धार्मिक हो सकती है, वही किसी अन्य व्यक्ति को अंधविश्वास लग सकती है। ऐसे में अदालत द्वारा इस तरह का निर्णय देना खतरनाक हो सकता है।
अदालत के पास न्यायिक समीक्षा का अधिकार
इस पर न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने कहा कि अदालत के पास न्यायिक समीक्षा का अधिकार है और वह यह तय कर सकती है कि कोई प्रथा अंधविश्वास है या नहीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसके बाद कानून बनाना या कार्रवाई करना विधायिका का काम हो सकता है, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि अंतिम निर्णय केवल विधायिका ही करेगी।
पुनर्विचार याचिकाएं की दाखिल
यह मामला पिछले 26 वर्षों से अदालतों में लंबित है। वर्ष 2018 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से मंदिर में 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को असंवैधानिक करार देते हुए हटा दिया था। इसके बाद इस फैसले के खिलाफ 50 से अधिक पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल की गईं।
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22 अप्रैल तक सुनवाई
अब सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ 7 अप्रैल से 22 अप्रैल तक इन सभी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। तय कार्यक्रम के अनुसार, याचिकाकर्ता और उनके समर्थन में दलीलें 7 से 9 अप्रैल तक पेश की जाएंगी, जबकि विरोध करने वाले पक्ष 14 से 16 अप्रैल तक अपनी बात रखेंगे।
कोर्ट में मेहता ने दिए ये तर्क
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वह यह तय करने का अधिकार रखती है कि किसी धर्म में कौन-सी प्रथा अंधविश्वास पर आधारित है।
वहीं मेहता ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के मामलों में संबंधित धार्मिक संप्रदाय का सदस्य होना जरूरी है।
भक्तों द्वारा दाखिल नहीं की गई याचिकाएं
इस पर न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना ने सवाल उठाया कि मूल याचिकाएं भक्तों द्वारा दाखिल नहीं की गई हैं, बल्कि युवा वकीलों के एक समूह ने यह मामला उठाया है।
उन्होंने पूछा कि क्या किसी गैर-भक्त द्वारा धार्मिक परंपराओं को चुनौती दी जा सकती है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि यदि किसी याचिका में जनहित का तत्व मौजूद है, तो अदालत उसकी जांच कर सकती है।
सुनवाई के दौरान क्या बोले मेहता
सुनवाई के दौरान ‘संवैधानिक नैतिकता’ और ‘सामाजिक नैतिकता’ के बीच अंतर को लेकर भी विस्तृत बहस हुई। मेहता ने कहा कि अदालत को निर्णय केवल सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य जैसे संवैधानिक मानकों के आधार पर करना चाहिए, न कि अस्पष्ट अवधारणाओं के आधार पर।
कोर्ट ‘अंधविश्वास’ के आधार पर नहीं कर सकती हस्तक्षेप
वहीं न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने यह सवाल उठाया कि यदि कोई प्रथा सार्वजनिक व्यवस्था या स्वास्थ्य के खिलाफ है, तो क्या अदालत हस्तक्षेप नहीं कर सकती। इस पर मेहता ने कहा कि अदालत हस्तक्षेप कर सकती है, लेकिन ‘अंधविश्वास’ के आधार पर नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर।
यह मामला न केवल धार्मिक स्वतंत्रता बल्कि महिलाओं के अधिकार, समानता और गरिमा जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक मुद्दों से जुड़ा हुआ है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में इस पर सुनवाई जारी है और आने वाले दिनों में इस पर अहम कानूनी और संवैधानिक निष्कर्ष सामने आ सकते हैं।