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MP Suicide Case : MP में 3 साल में 56 हजार से ज्यादा आत्महत्याएं, आंकड़ों ने बढ़ाई चिंता

सुसाइड

MP Suicide Case : भोपाल। मध्य प्रदेश में आनंद विभाग होने के बावजूद राज्य में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा संकट गहराता नजर आ रहा है। हाल ही में सामने आए आंकड़ों के मुताबिक 1 जनवरी 2022 से अब तक 56 हजार से अधिक लोगों ने आत्महत्या की है। यह स्थिति सामाजिक और मानसिक स्वास्थ्य के स्तर पर गंभीर चिंता पैदा करती है। इन मामलों के पीछे नशे की लत, आर्थिक तंगी और मानसिक समस्याएं प्रमुख कारण के रूप में सामने आई हैं।

बढ़ता तनाव और नींद की कमी

आंकड़ों के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में 5 हजार से ज्यादा आत्महत्याएं नशे की वजह से हुई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार बढ़ता तनाव और नींद की कमी भी लोगों को अवसाद की ओर धकेल रहे हैं। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक आज की तेज रफ्तार जिंदगी और बदलती जीवनशैली का असर सीधे मानसिक स्थिति पर पड़ रहा है।

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4 हजार लोगों ने कर्ज के चलते गंवाई जान

कर्ज और आर्थिक दबाव भी आत्महत्या के बड़े कारणों में शामिल हैं। बीते वर्षों में करीब 4 हजार लोगों ने आर्थिक तंगी और कर्ज के चलते अपनी जान गंवाई है। यह दर्शाता है कि आर्थिक अस्थिरता और सामाजिक दबाव लोगों को मानसिक रूप से कमजोर बना रहे हैं। इसके अलावा डिप्रेशन से जुड़े 7 हजार से अधिक मामले सामने आ चुके हैं।

16% मामलों में पारिवारिक कलह

अगर कारणों का प्रतिशत देखा जाए तो करीब 16% मामलों में पारिवारिक कलह, 14% में अवसाद, 11% में लंबी बीमारी और 9% मामलों में नशे की लत मुख्य वजह रही है। वहीं लगभग 7% मामलों में आर्थिक तंगी और कर्ज का दबाव जिम्मेदार पाया गया है।

सीनियर साइकैट्रिस्ट डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी के अनुसार संयुक्त परिवार से एकल परिवार की ओर बढ़ता रुझान, कम नींद और बढ़ता पूंजीवाद भी अवसाद और ऐसे मामलों के पीछे अहम कारण हैं।

डिजिटल लत गंभीर समस्या

डिजिटल लत भी अब एक नई और गंभीर समस्या के रूप में सामने आई है। करीब 2.2% मामलों, यानी 1200 से ज्यादा मामलों में मोबाइल, ऑनलाइन गेमिंग और सोशल मीडिया की लत को जिम्मेदार माना गया है। पहले यह समस्या बड़े शहरों तक सीमित थी, लेकिन अब सागर, मुरैना और हरदा जैसे छोटे शहरों में भी इसके मामले तेजी से बढ़ रहे हैं।

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भोपाल समेत इन शहरों में अधिक मामले

भौगोलिक रूप से देखें तो सागर, भोपाल, खरगोन, धार और ग्वालियर जैसे शहरों में ऐसे मामलों की संख्या अधिक है। यह संकेत देता है कि यह समस्या अब पूरे राज्य में फैल चुकी है। इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी भी शुरू हो गई है।

कांग्रेस प्रवक्ता राहुल राज ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि किसान, युवा और महिलाएं सभी परेशान हैं, जबकि आनंद विभाग अपने उद्देश्य को पूरा नहीं कर पा रहा है। वहीं भाजपा के प्रवक्ता अजय सिंह यादव ने इन घटनाओं को चिंताजनक बताते हुए कहा कि सरकार इस दिशा में काम कर रही है और जल्द ही ऐसी नीतियां बनाई जाएंगी, जिससे अवसाद के मामलों में कमी लाई जा सके।

स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की जरूरत

इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ी समस्या मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की कमी है। राज्य में मनोचिकित्सकों की कमी है और कई सरकारी अस्पतालों में काउंसलर व क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट के पद खाली पड़े हैं। इसके कारण लोगों में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता भी कम है।

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विशेषज्ञों का मानना है कि बड़ी संख्या में लोगों को यह तक पता नहीं होता कि उनकी मानसिक समस्या का इलाज संभव है। यह स्थिति साफ तौर पर दर्शाती है कि राज्य में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने, नशामुक्ति केंद्रों की संख्या बढ़ाने और आर्थिक परामर्श जैसी सुविधाओं को विस्तार देने की जरूरत है। समय रहते सही मदद और मार्गदर्शन मिलने से कई लोगों को इस संकट से बाहर निकाला जा सकता है।

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