Assembly Election 2026 : देश में पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव का बिगुल बज गया है। भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) ने पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में होने वाले विधानसभा चुनावों की तारीखों की घोषणा कर दी है। इन राज्यों में कुल 824 सीटों पर मतदान होगा और लगभग 17.4 करोड़ मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे। चुनाव कार्यक्रम घोषित होते ही इन राज्यों में आचार संहिता भी लागू हो गई है।
कब और कहां होगी वोटिंग
घोषित कार्यक्रम के अनुसार पश्चिम बंगाल में दो चरणों में मतदान कराया जाएगा। पहले चरण के लिए 23 अप्रैल को 154 सीटों पर वोटिंग होगी, जबकि दूसरे चरण में 29 अप्रैल को 142 सीटों पर मतदान होगा।
वहीं तमिलनाडु में 23 अप्रैल को एक ही चरण में मतदान होगा। इसके अलावा असम, केरल और पुडुचेरी में 9 अप्रैल को एक ही चरण में वोट डाले जाएंगे। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार (Gyanesh Kumar) ने बताया कि पांचों राज्यों के चुनाव परिणाम 4 मई को घोषित किए जाएंगे।
बंगाल में 35 साल बाद सिर्फ दो चरणों में चुनाव
पश्चिम बंगाल में इस बार सिर्फ दो चरणों में चुनाव होने जा रहे हैं, जो करीब 35 साल बाद हो रहा है। इससे पहले 2021 में यहां 8 चरणों में चुनाव हुए थे।
राजनीतिक दलों की मांग को देखते हुए चुनाव आयोग ने चरणों की संख्या कम करने का फैसला लिया। आयोग का मानना है कि कम चरणों में चुनाव कराने से सुरक्षा बलों की बेहतर तैनाती हो सकेगी और हिंसा की घटनाओं पर भी नियंत्रण रहेगा।
मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर बदलाव
चुनाव से पहले स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान मतदाता सूची में भी बड़ा बदलाव हुआ है। तमिलनाडु में सबसे ज्यादा करीब 74 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं। इसके बाद पश्चिम बंगाल में लगभग 58 लाख, केरल में करीब 8 लाख, असम में 2 लाख और पुडुचेरी में करीब 77 हजार मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं।
कम चरणों में चुनाव से क्या होगा असर
विश्लेषकों का मानना है कि कम चरणों में चुनाव होने से राजनीतिक दलों को अपनी रणनीति तेजी से लागू करनी होगी। खासतौर पर पश्चिम बंगाल में जहां ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिल सकता है।
Transgender Bill 2026 : ट्रांसजेंडर पहचान नियम होंगे सख्त, मेडिकल बोर्ड की सिफारिश होगी अनिवार्य
कम समय में चुनाव होने से प्रचार अभियान भी तेज और सीमित अवधि का होगा। इससे राजनीतिक दलों की रणनीति, संसाधन और संगठनात्मक क्षमता की असली परीक्षा होगी।
अब सभी की नजरें आने वाले चुनावी मुकाबले और 4 मई को आने वाले नतीजों पर टिकी हैं, जो इन राज्यों की राजनीति की नई दिशा तय करेंगे।