Transgender Persons Amendment Bill : नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने ट्रांसजेंडर पहचान और जेंडर परिवर्तन से जुड़े नियमों को और स्पष्ट व सख्त बनाने की दिशा में कदम उठाया है। इसके तहत ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 को लोकसभा में पेश किया गया। इस विधेयक में ट्रांसजेंडर पहचान की प्रक्रिया में मेडिकल बोर्ड की भूमिका अनिवार्य करने और पहचान की परिभाषा को अधिक स्पष्ट करने का प्रस्ताव है।
सामाजिक न्याय मंत्री ने पेश किया विधेयक
केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री वीरेंद्र कुमार ने यह संशोधन विधेयक लोकसभा में पेश किया। प्रस्ताव के अनुसार, किसी व्यक्ति को ट्रांसजेंडर पहचान का प्रमाणपत्र जारी करने से पहले मेडिकल बोर्ड की सिफारिश जरूरी होगी। इसके बाद जिला मजिस्ट्रेट (DM) की ओर से आधिकारिक प्रमाणपत्र जारी किया जाएगा।
मेडिकल बोर्ड की भूमिका होगी अहम
विधेयक के तहत मेडिकल बोर्ड का गठन मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) की अध्यक्षता में किया जाएगा। ट्रांसजेंडर पहचान के लिए आवेदन करने वाले व्यक्ति की मेडिकल बोर्ड द्वारा जांच की जाएगी और उसकी रिपोर्ट जिला मजिस्ट्रेट को भेजी जाएगी। इसके आधार पर ही पहचान प्रमाणपत्र जारी किया जाएगा।
सरकार ने बताई बदलाव की वजह
सरकार का कहना है कि मौजूदा कानून में ट्रांसजेंडर की परिभाषा काफी व्यापक और अस्पष्ट है। इससे वास्तविक लाभार्थियों की पहचान करना मुश्किल हो जाता है। नए संशोधन में परिभाषा को अधिक स्पष्ट किया गया है, ताकि उन लोगों को प्राथमिकता मिल सके जो वास्तव में सामाजिक भेदभाव का सामना कर रहे हैं।
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जेंडर परिवर्तन के लिए भी नई प्रक्रिया
यदि कोई व्यक्ति सर्जरी के माध्यम से अपना जेंडर बदलता है, तो संबंधित मेडिकल संस्थान को इसकी सूचना जिला प्रशासन और मेडिकल प्राधिकरण को देनी होगी। इसके बाद व्यक्ति को आवेदन के साथ मेडिकल सुपरिंटेंडेंट या मुख्य चिकित्सा अधिकारी का प्रमाणपत्र देना होगा। इसी आधार पर जिला मजिस्ट्रेट जेंडर परिवर्तन का प्रमाणपत्र जारी करेंगे।
दस्तावेजों में नाम बदलने का अधिकार
पहचान प्रमाणपत्र मिलने के बाद ट्रांसजेंडर व्यक्ति अपने जन्म प्रमाणपत्र सहित अन्य सरकारी दस्तावेजों में नाम बदलने का अधिकार प्राप्त कर सकेगा।
गंभीर अपराधों पर कड़ी सजा
विधेयक में ट्रांसजेंडर समुदाय की सुरक्षा को लेकर भी कड़े प्रावधान किए गए हैं। किसी व्यक्ति को जबरन ट्रांसजेंडर पहचान अपनाने के लिए मजबूर करना, शारीरिक नुकसान पहुंचाना या बच्चों को ऐसे कृत्यों में धकेलना गंभीर अपराध माना जाएगा। इसके लिए 10 साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान रखा गया है।