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West Bengal SIR Case : चुनाव की आंधी से अंधे नहीं बन सकते -बंगाल SIR पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी

West Bengal SIR Case

West Bengal SIR Case : नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) ने पश्चिम बंगाल के SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) मामले की सुनवाई के दौरान अहम और सख्त टिप्पणियां की हैं। कोर्ट ने कहा कि जिस देश में व्यक्ति पैदा हुआ है, वहां वोट देना केवल एक कानूनी अधिकार नहीं, बल्कि एक भावनात्मक मुद्दा भी है। अदालत ने यह भी कहा कि चुनावी माहौल की “धूल और आक्रोश” के बीच सच्चाई से आंखें नहीं मूंदी जा सकतीं।

यह टिप्पणी कोर्ट ने कुरैशा यास्मिन की याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिनका नाम SIR प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से हटा दिया गया था। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि इस तरह के मामलों में एक मजबूत अपीलीय तंत्र की आवश्यकता है, क्योंकि बड़ी संख्या में लोग अपने वोटिंग अधिकार को लेकर अपील करते हैं।

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आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए

सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” जैसी श्रेणी केवल पश्चिम बंगाल में ही देखी गई है, जबकि अन्य राज्यों में ऐसा नहीं हुआ।

कोर्ट ने यह भी इंगित किया कि चुनाव आयोग (Election Commission) अपने पहले के रुख से अलग हो गया है। पहले आयोग का कहना था कि 2002 की मतदाता सूची में शामिल लोगों को दस्तावेज देने की जरूरत नहीं होगी, लेकिन अब यह रुख बदलता नजर आ रहा है।

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याचिकाकर्ता को कोर्ट ने दी ये सलाह

कोर्ट ने याचिकाकर्ता को सलाह दी कि वे इस उद्देश्य के लिए बनाए गए अपीलीय ट्रिब्यूनल का रुख करें। साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग और राज्य के बीच भरोसे की कमी को देखते हुए न्यायिक अधिकारियों की मदद ली गई थी। इस बीच, निर्वाचन आयोग ने पहले चरण की सीटों के लिए 9 अप्रैल को मतदाता सूची को अंतिम रूप देकर “फ्रीज” कर दिया है।

इसका मतलब यह है कि जिन लोगों का नाम सूची से हटा दिया गया है, वे इस चुनाव में मतदान नहीं कर सकेंगे। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव दो चरणों में 23 और 29 अप्रैल को होंगे, जबकि मतगणना 4 मई को होगी।

91 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटाए

आंकड़ों के मुताबिक, SIR अभियान के बाद राज्य में करीब 91 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं, जिससे यह मुद्दा राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील बन गया है।

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मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) ने निर्वाचन आयोग पर आरोप लगाया है कि मतुआ, राजबंशी और अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को निशाना बनाकर उनके नाम हटाए गए हैं।

वहीं, सुवेंदु अधिकारी (Suvendu Adhikari) ने कहा कि राज्य में अवैध घुसपैठियों के लिए कोई जगह नहीं है। इस पूरे मामले ने चुनावी माहौल को और अधिक गर्म कर दिया है और आने वाले दिनों में इस पर और बहस तेज होने की संभावना है।

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