SC on Protesters Lathicharge : सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश! नाबालिग प्रदर्शनकारियों को तुरंत रिहा करें, बल प्रयोग करने वालों पर कार्रवाई
SC on Protesters Lathicharge : अदालत ने कहा कि भविष्य में किसी भी प्रदर्शन के दौरान पुलिस के लिए स्पष्ट और आधुनिक प्रोटोकॉल होना चाहिए, ताकि अनावश्यक बल प्रयोग की स्थिति से बचा जा सके।
SC on Protesters Lathicharge : नई दिल्ली। संसद मार्च के दौरान छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है। अदालत ने साफ कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि जांच में जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग की पुष्टि होती है तो जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी। अदालत ने कहा कि लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शन होते रहेंगे और प्रशासन को भी कानून के दायरे में रहकर कार्रवाई करनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई अपने पास रखी
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है। याचिकाकर्ताओं ने बताया कि मामला केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है, बल्कि मध्य प्रदेश, बिहार और नागपुर सहित कई राज्यों से जुड़ा हुआ है।
इसी कारण सुप्रीम कोर्ट ने सभी याचिकाओं को अलग-अलग हाईकोर्ट भेजने के बजाय खुद सुनवाई जारी रखने का फैसला किया। अदालत का मानना है कि एक समान आदेश से सभी राज्यों में स्पष्ट दिशा-निर्देश तय किए जा सकते हैं।
बल प्रयोग के गंभीर आरोपों की होगी निष्पक्ष जांच
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि याचिकाओं में पेलेट गन, इलेक्ट्रिक बैटन, लाठीचार्ज, आंसू गैस, महिलाओं और पत्रकारों के साथ मारपीट जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन सभी आरोपों की स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी जांच कराई जाएगी। अदालत ने कहा कि यदि दोष तय नहीं होंगे तो जांच का कोई महत्व नहीं रहेगा। इसलिए हर आरोप की जांच सबूतों के आधार पर होगी।
केंद्र सरकार ने रखा अपना पक्ष
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में कहा कि छात्रों को शांतिपूर्ण प्रदर्शन का पूरा अधिकार है, लेकिन कानून तोड़ने वालों के खिलाफ कार्रवाई होना भी जरूरी है। उन्होंने बताया कि इस घटना में करीब 250 पुलिसकर्मी भी घायल हुए हैं।
कोर्ट ने कहा कि यह भी जांच का विषय होगा कि पुलिस पर हमला प्रदर्शनकारियों ने किया या आंदोलन में शामिल हुए असामाजिक तत्वों ने। अदालत ने दोनों पक्षों की बात सुनने के बाद निष्पक्ष जांच पर जोर दिया।
पुलिस प्रोटोकॉल में बदलाव की जरूरत
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले भी पुलिस कार्रवाई को लेकर कई दिशा-निर्देश जारी कर चुका है। अब समय आ गया है कि पुराने नियमों की समीक्षा की जाए और वर्तमान परिस्थितियों के अनुसार उन्हें अपडेट किया जाए।
अदालत ने कहा कि भविष्य में किसी भी प्रदर्शन के दौरान पुलिस के लिए स्पष्ट और आधुनिक प्रोटोकॉल होना चाहिए, ताकि अनावश्यक बल प्रयोग की स्थिति से बचा जा सके।
डिजिटल डेटा और फेस रिकग्निशन पर उठे सवाल
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने दावा किया कि प्रदर्शन के दौरान फेस रिकग्निशन तकनीक का इस्तेमाल कर प्रदर्शनकारियों की पहचान की गई।
आरोप लगाया गया कि आधार डेटा से पहचान जोड़कर लोगों को पूछताछ के लिए नोटिस भेजे गए। उन्होंने कहा कि इस तरह की डिजिटल प्रोफाइलिंग नागरिकों की निजता से जुड़ा गंभीर मुद्दा है। अदालत ने इस पहलू को भी जांच के दायरे में शामिल करने की बात कही।
जांच समिति बनाने पर अदालत करेगी फैसला
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने जांच समिति की अगुआई के लिए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीशों के नाम सुझाए। सॉलिसिटर जनरल ने भी कहा कि यदि अदालत उचित समझे तो जांच समिति बनाई जा सकती है।
उन्होंने भरोसा दिलाया कि सभी रिकॉर्ड और डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखे जा रहे हैं। अदालत ने कहा कि जांच समिति की संरचना पर उचित समय पर फैसला सुनाया जाएगा।
लोकतंत्र में आंदोलन जरूरी, कानून का पालन भी जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शन लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। अदालत ने दोहराया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन संवैधानिक अधिकार है, लेकिन कानून का उल्लंघन किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि यदि किसी अधिकारी ने जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग किया है तो उसके खिलाफ कार्रवाई होगी। साथ ही यदि किसी प्रदर्शनकारी ने कानून तोड़ा है तो उसके खिलाफ भी कानूनी प्रक्रिया अपनाई जाएगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि निष्पक्ष जांच ही पूरे मामले की सच्चाई सामने लाएगी।