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Chaitra Navratri 2026 : चैत्र नवरात्रि का शुभारंभ आज से, जानिए घट स्थापना के मुहूर्त और पूजा-व्रत का महत्व

Chaitra Navratri 2026

Chaitra Navratri 2026 : नई दिल्ली। आज से चैत्र नवरात्रि की शुरुआत हो गई है। यह पावन पर्व 19 मार्च से 27 मार्च तक मनाया जाएगा। वसंत ऋतु में आने के कारण इसे वासंती नवरात्र भी कहा जाता है। हिंदू नववर्ष के साथ शुरू होने के कारण यह साल की पहली नवरात्रि मानी जाती है। इन नौ दिनों में देवी पूजा के साथ-साथ व्रत का विशेष महत्व होता है।

आयुर्वेद के अनुसार वसंत ऋतु की शुरुआत के साथ बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में इस समय खानपान पर विशेष ध्यान देने की परंपरा है। माना जाता है कि नवरात्रि में संयमित आहार और व्रत रखने से शरीर पूरे साल स्वस्थ रहता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार साल में दो नवरात्रि सबसे खास मानी जाती हैं। पहली वसंत ऋतु में मनाई जाने वाली चैत्र नवरात्रि होती है, जबकि दूसरी शरद ऋतु (सितंबर-अक्टूबर) में आने वाली शारदीय नवरात्रि होती है।

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घट स्थापना के शुभ मुहूर्त

नवरात्रि के पहले दिन घट स्थापना के लिए कई शुभ मुहूर्त उपलब्ध हैं। सुबह 6:30 से 8:00 तक शुभ मुहूर्त रहेगा। इसके बाद सुबह 11:00 से दोपहर 12:30 तक चंचल मुहूर्त और दोपहर 2:00 से 3:30 तक अमृत मुहूर्त रहेगा। शाम 5:00 से 6:30 तक शुभ मुहूर्त और सुबह 10:55 से दोपहर 12:35 तक अभिजीत मुहूर्त भी रहेगा। इसके अलावा शाम 6:30 से रात 8:00 तक अमृत मुहूर्त, दोपहर 12:30 से 2:00 तक लाभ मुहूर्त और रात 8:00 से 9:30 तक चंचल मुहूर्त भी घट स्थापना के लिए अनुकूल हैं।

नौ दिनों की पूजा विधि

नवरात्रि के नौ दिनों में नियमित पूजा का विशेष महत्व होता है। हर दिन पूजा से पहले अपने ऊपर गंगाजल छिड़कना चाहिए, तिलक लगाना चाहिए और दीपक जलाना चाहिए। पूजा की शुरुआत सबसे पहले गणेशजी से की जाती है, इसके बाद देवी पार्वती, कलश और फिर देवी दुर्गा की पूजा की जाती है।

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प्रतिदिन देवी लक्ष्मी, सरस्वती और कालिका की भी आराधना की जाती है। पूजा में कुमकुम, चावल, हल्दी, मेहंदी, फूल और इत्र का उपयोग किया जाता है। पूजा के अंत में नैवेद्य अर्पित कर आरती की जाती है और प्रसाद बांटा जाता है।

कलश स्थापना का महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मिट्टी का कलश पृथ्वी तत्व का प्रतीक होता है। इसमें भरा जल और उसमें मौजूद वायु तत्व जीवन का आधार माने जाते हैं, जबकि पास रखा दीपक अग्नि तत्व का प्रतीक होता है।

कलश में आकाश तत्व यानी ब्रह्मांड की सकारात्मक ऊर्जा का आवाहन करना ही घट स्थापना कहलाता है। मान्यता है कि जल से ही सृष्टि की उत्पत्ति हुई है और जल में सभी देवी-देवताओं का निवास होता है, इसलिए कलश में शक्ति का आवाहन किया जाता है।

नौ दिनों तक अलग-अलग देवी की पूजा क्यों

नवरात्रि के दौरान हर दिन देवी के अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है। हालांकि केवल देवी दुर्गा की पूजा करना भी मान्य है, क्योंकि धार्मिक ग्रंथों के अनुसार देवी दुर्गा के ही नौ रूपों की आराधना की जाती है। इन नौ रूपों को नवदुर्गा कहा जाता है। यह परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है और इसका उल्लेख पुराने ग्रंथों में भी मिलता है।

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व्रत रखने का महत्व

नवरात्रि में व्रत रखने से खानपान में संयम आता है और शरीर को लाभ मिलता है। व्रत के दौरान शरीर अपनी कमजोर कोशिकाओं को तोड़कर ऊर्जा बनाता है, जिससे अच्छी कोशिकाएं सुरक्षित रहती हैं। इस प्रक्रिया को ऑटोफेजी कहा जाता है।

इसी प्रक्रिया को समझाने के लिए जापानी वैज्ञानिक योशिनोरी ओशुमी को वर्ष 2016 में मेडिसिन का नोबेल पुरस्कार मिला था। शोध के अनुसार उपवास शरीर को हल्के तनाव में डालता है, जिससे कोशिकाएं मजबूत होती हैं और शरीर की कार्यक्षमता बढ़ती है।

व्रत के नियम और कायदे

नवरात्रि का व्रत केवल भोजन तक सीमित नहीं होता, बल्कि इसमें मन, वचन और कर्म का भी संयम जरूरी होता है। मानसिक व्रत में व्यक्ति को काम, क्रोध और लोभ जैसे विचारों का त्याग करना चाहिए। वाचिक व्रत में हमेशा सत्य बोलना चाहिए और ऐसी बात नहीं कहनी चाहिए जिससे किसी को दुख पहुंचे।

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कायिक व्रत में किसी भी प्रकार की हिंसा से बचना चाहिए और ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए जिससे किसी को नुकसान हो। इस तरह का संयम व्यक्ति के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों के लिए लाभकारी माना जाता है।

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