Yashwant Varma Resign : प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज यशवंत वर्मा (Yashwant Varma) ने राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा सौंप दिया है। उनके इस्तीफे की खबर शुक्रवार को सामने आई, हालांकि उन्होंने इस्तीफा कब दिया, यह स्पष्ट नहीं हो पाया है। यह फैसला उस समय आया है जब वे लंबे समय से कैश कांड और उससे जुड़ी जांच को लेकर विवादों में घिरे हुए थे।
ये है पूरा मामला
दरअसल, 14 मार्च 2025 को दिल्ली स्थित उनके सरकारी आवास में आग लगने की घटना हुई थी। इस दौरान मौके पर पहुंचे दमकल कर्मियों को स्टोर रूम में 500-500 रुपये के जले हुए नोटों के बंडल मिले थे। इस घटना के बाद मामला बेहद गंभीर हो गया था और जस्टिस वर्मा पर सवाल उठने लगे थे।
दिल्ली HC से ट्रांसफर कर इलाहाबाद ट्रांसफर
विवाद के बाद उन्हें दिल्ली हाईकोर्ट से ट्रांसफर कर इलाहाबाद हाईकोर्ट भेज दिया गया था। उन्होंने 5 अप्रैल 2025 को इलाहाबाद हाईकोर्ट में शपथ ली थी, लेकिन जांच पूरी होने तक उन्हें कोई न्यायिक जिम्मेदारी नहीं सौंपी गई थी।
लोकसभा में महाभियोग प्रस्ताव
इस मामले में उनका नाम सामने आने के बाद लोकसभा में उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव भी लाया गया था। जस्टिस वर्मा ने इस प्रस्ताव को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
उन्होंने अपनी याचिका में कहा था कि जब राज्यसभा में महाभियोग प्रस्ताव मंजूर नहीं हुआ, तो लोकसभा द्वारा अकेले जांच समिति का गठन करना गलत है।
इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
इस मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 6 जनवरी को कहा था कि जांच समिति के गठन में कुछ खामियां दिखाई देती हैं। हालांकि कोर्ट ने यह भी कहा कि वह यह तय करेगा कि ये खामियां कितनी गंभीर हैं।
8 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने इस मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया था। यह सुनवाई जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने की थी।
लोकसभा स्पीकर को जांच समिति बनाने का अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले 7 जनवरी को भी टिप्पणी करते हुए कहा था कि लोकसभा स्पीकर द्वारा गठित जांच पैनल में कुछ खामियां नजर आती हैं।
हालांकि कोर्ट ने यह भी माना कि जजेज इन्क्वायरी एक्ट के तहत लोकसभा स्पीकर को जांच समिति बनाने का अधिकार है, भले ही राज्यसभा में प्रस्ताव खारिज हो चुका हो।
बचाव में ये बोले जस्टिस वर्मा
कैश कांड (cash scandal) में जस्टिस वर्मा ने खुद को निर्दोष बताते हुए कहा था कि उनके घर या स्टोर रूम में कोई नकदी नहीं थी और उन्हें साजिश के तहत फंसाया गया है। कुछ रिपोर्ट्स में उनके घर से 15 करोड़ रुपये मिलने का दावा भी किया गया था, जिसे उन्होंने खारिज किया।
इस पूरे विवाद के बीच 22 मार्च 2025 को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने उनका तबादला इलाहाबाद हाईकोर्ट कर दिया था। इसके बाद भी जांच और कानूनी प्रक्रिया जारी रही।
दोनों सदनों के महासचिवों से मांगा था जवाब
इस मामले में 16 दिसंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला (Om Birla) को नोटिस जारी किया था और दोनों सदनों के महासचिवों से जवाब मांगा था।
कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया था कि जब राज्यसभा में प्रस्ताव खारिज हो गया, तो लोकसभा में जांच समिति कैसे गठित की गई।
प्रक्रिया में दोनों सदनों की भूमिका जरूरी
जस्टिस वर्मा ने जांच पैनल को असंवैधानिक बताते हुए याचिका दायर की थी। उनका कहना था कि जज को हटाने की प्रक्रिया में लोकसभा और राज्यसभा दोनों की भूमिका जरूरी होती है, इसलिए केवल लोकसभा स्पीकर द्वारा समिति बनाना संविधान के खिलाफ है।
इससे पहले तीन हाईकोर्ट जजों की जांच में जस्टिस वर्मा को दोषी पाया गया था और उन्हें पद से हटाने की सिफारिश की गई थी। इसके बाद सरकार ने संसद में महाभियोग प्रस्ताव पेश किया, जिसे 146 सांसदों के समर्थन के साथ स्वीकार किया गया।
क्या है महाभियोग की प्रक्रिया
भारत में किसी हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने के लिए संसद के किसी भी सदन में महाभियोग प्रस्ताव लाया जा सकता है।
इसके बाद स्पीकर या सभापति एक जांच समिति का गठन करते हैं, जिसमें सुप्रीम कोर्ट का एक जज, हाईकोर्ट का एक चीफ जस्टिस और एक विधि विशेषज्ञ शामिल होता है।
यदि जांच में आरोप साबित होते हैं, तो संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित किया जाता है। इसके बाद प्रस्ताव राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है और उनकी मंजूरी मिलने पर संबंधित जज को पद से हटा दिया जाता है।
कौन हैं जस्टिस यशवंत वर्मा
यशवंत वर्मा (Yashwant Varma) का जन्म 6 जनवरी 1969 को इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। उन्होंने हंसराज कॉलेज से ग्रेजुएशन, दिल्ली विश्वविद्यालय से बी.कॉम (ऑनर्स) और रीवा विश्वविद्यालय से एलएलबी की पढ़ाई की।
उन्होंने 8 अगस्त 1992 को वकालत शुरू की। साल 2006 में इलाहाबाद हाईकोर्ट में स्पेशल एडवोकेट बने और 2012-13 में उत्तर प्रदेश के चीफ स्टैंडिंग काउंसिल रहे। अगस्त 2013 में उन्हें सीनियर वकील बनाया गया।
13 अक्टूबर 2014 को वे इलाहाबाद हाईकोर्ट में एडिशनल जज बने और 1 फरवरी 2016 को परमानेंट जज नियुक्त हुए। 11 अक्टूबर 2021 को उन्हें दिल्ली हाईकोर्ट का जज बनाया गया था।