Vande Mataram : नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ को लेकर विस्तृत नए दिशानिर्देश जारी किए हैं। गृह मंत्रालय द्वारा 28 जनवरी को जारी आदेश की जानकारी 11 फरवरी को सार्वजनिक हुई। नए प्रोटोकॉल के अनुसार अब सरकारी कार्यक्रमों, सरकारी स्कूलों और अन्य औपचारिक आयोजनों में ‘वंदे मातरम’ बजाया या गाया जाएगा और इस दौरान सभी लोगों का सावधान मुद्रा में खड़ा होना अनिवार्य होगा। यदि राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान दोनों प्रस्तुत किए जाएं, तो पहले ‘वंदे मातरम’ और उसके बाद ‘जन गण मन’ गाया जाएगा।
क्या हैं प्रमुख बदलाव
नए नियमों के तहत अब राष्ट्रगीत के सभी छह अंतरे सामूहिक रूप से गाए या बजाए जाएंगे। इसकी कुल अवधि 3 मिनट 10 सेकेंड (190 सेकेंड) तय की गई है। अब तक प्रचलन में मुख्यतः पहले दो अंतरे ही गाए जाते थे।
राष्ट्रगान की तरह ही ‘वंदे मातरम’ के दौरान भी लोगों को सावधान मुद्रा में खड़ा रहना होगा। मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि केवल आधिकारिक संस्करण ही इस्तेमाल किया जाएगा।
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किन अवसरों पर अनिवार्य होगा ‘वंदे मातरम’
नई गाइडलाइन के अनुसार निम्न अवसरों पर राष्ट्रगीत अनिवार्य रूप से गाया या बजाया जाएगा-
- राष्ट्रध्वज को परेड में लाते समय
- तिरंगा फहराते समय
- किसी कार्यक्रम में राष्ट्रपति के आगमन पर
- राष्ट्रपति के संबोधन से पहले और बाद में
- राज्यपाल/उपराज्यपाल के समारोहों में
- राज्यपालों के भाषण से पहले और बाद में
- सिविलियन अवॉर्ड समारोह (भारत रत्न, पद्म विभूषण, पद्म भूषण, पद्मश्री)
- स्कूलों में कार्य शुरू होने से पहले। हालांकि मंत्रालय ने यह भी कहा है कि सभी संभावित अवसरों की सूची देना संभव नहीं है।
सिनेमा हॉल में क्या लागू होगा?
नए नियम सिनेमा हॉल पर लागू नहीं होंगे। यानी फिल्मों से पहले ‘वंदे मातरम’ बजाना और खड़ा होना अनिवार्य नहीं होगा। यदि किसी न्यूजरील या डॉक्यूमेंट्री के हिस्से के रूप में राष्ट्रगीत प्रस्तुत किया जाता है, तो दर्शकों के लिए खड़ा होना जरूरी नहीं होगा, ताकि प्रदर्शन में व्यवधान न आए।
150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में पहल
केंद्र सरकार इस समय ‘वंदे मातरम’ के 150 वर्ष पूरे होने का आयोजन कर रही है। इसी क्रम में 77वें गणतंत्र दिवस की परेड की थीम भी ‘वंदे मातरम’ रखी गई थी। संस्कृति मंत्रालय की झांकी ‘वंदे मातरम: एक राष्ट्र की आत्मा की पुकार’ को बेस्ट झांकी का पुरस्कार मिला था।
क्या है वंदे मातरम का इतिहास
‘वंदे मातरम’ की रचना बंकिम चंद्र चटर्जी ने 7 नवंबर 1875 को की थी। यह 1882 में उनके उपन्यास ‘आनंदमठ’ में प्रकाशित हुआ। 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे पहली बार सार्वजनिक रूप से गाया। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यह गीत क्रांतिकारियों का प्रेरणास्रोत और नारा बन गया।
1905 के बंग-भंग आंदोलन के दौरान ‘वंदे मातरम’ राजनीतिक नारे के रूप में उभरा। ब्रिटिश शासन ने कई स्थानों पर इसके सार्वजनिक गायन पर रोक लगाई, लेकिन देशभर में आंदोलनकारियों ने इसे विरोध के प्रतीक के रूप में अपनाया।
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1937 में क्यों हटाए गए चार छंद?
1930 के दशक में सांप्रदायिक तनाव बढ़ने के बीच मुस्लिम लीग ने गीत के कुछ हिस्सों पर आपत्ति जताई। 1937 में कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने निर्णय लिया कि राष्ट्रीय आयोजनों में केवल पहले दो छंद ही गाए जाएंगे।
इस निर्णय में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, सुभाष चंद्र बोस सहित कई नेता शामिल थे। बाद में संविधान सभा ने भी इसी स्वरूप को स्वीकार किया।
1950 में मिला राष्ट्रगीत का दर्जा
24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की कि ‘जन गण मन’ भारत का राष्ट्रगान होगा, जबकि ‘वंदे मातरम’ को समान सम्मान और दर्जा दिया जाएगा, उसकी ऐतिहासिक भूमिका को देखते हुए।
हालिया राजनीतिक विवाद
वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने पर संसद के शीतकालीन सत्र में विशेष चर्चा हुई थी, जहां इस मुद्दे पर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी हुए। भाजपा और कांग्रेस के बीच 1937 के फैसले और उसके संदर्भों को लेकर बहस छिड़ी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में इस विषय पर विस्तृत भाषण दिया था।
अब क्या बदला है?
नए दिशानिर्देशों के तहत आधिकारिक आयोजनों में छहों छंद गाना अनिवार्य किया गया है, जिनमें वे चार छंद भी शामिल हैं जिन्हें 1937 में राष्ट्रीय आयोजनों से हटाया गया था। राष्ट्रगान से पहले राष्ट्रगीत गाने का क्रम तय किया गया है और सभी को सावधान मुद्रा में खड़े रहना होगा।
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इस तरह केंद्र सरकार ने पहली बार ‘वंदे मातरम’ के गायन और प्रस्तुति को लेकर विस्तृत और औपचारिक प्रोटोकॉल जारी किया है, जिससे इसके आयोजन और सम्मान को लेकर एकरूपता सुनिश्चित की जा सके।