हाइलाइट्स
- मोहन भागवत का बयान- संघ कहेगा तो तुरंत पद छोड़ने को तैयार।
- जाति नहीं, सेवा भाव से तय होता है सरसंघचालक।
- RSS में अंग्रेजी नहीं बनेगी मुख्य भाषा।
Mumbai RSS Centenary Program : मुंबई । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने रविवार को कहा कि यदि संघ उनसे सरसंघचालक का पद छोड़ने को कहेगा, तो वे बिना किसी संकोच के तुरंत ऐसा करेंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ में पद किसी व्यक्ति से बड़ा नहीं होता।
75 साल की उम्र को लेकर परंपरा पर बोले
मोहन भागवत ने कहा कि संघ में आमतौर पर 75 साल की उम्र के बाद जिम्मेदार पदों पर नहीं रहने की परंपरा की बात कही जाती है। हालांकि, अंतिम निर्णय संगठन की आवश्यकता और संघ की सामूहिक सोच पर निर्भर करता है।
सरसंघचालक बनने की योग्यता पर स्पष्ट संदेश
RSS प्रमुख ने कहा कि सरसंघचालक बनने के लिए किसी जाति विशेष से होना जरूरी नहीं है। क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र या ब्राह्मण होना कोई योग्यता नहीं है। जो व्यक्ति हिंदू समाज और संगठन के लिए निस्वार्थ भाव से काम करता है, वही इस पद के योग्य होता है।
वीर सावरकर को भारत रत्न देने की मांग
मोहन भागवत ने कहा कि यदि वीर सावरकर को भारत रत्न दिया जाता है, तो इससे पुरस्कार की गरिमा और अधिक बढ़ेगी। उन्होंने सावरकर के योगदान को देश के लिए महत्वपूर्ण बताया।
समान नागरिक संहिता पर संतुलित राय
भागवत ने कहा कि समान नागरिक संहिता सभी वर्गों को विश्वास में लेकर बनाई जानी चाहिए। इसका उद्देश्य समाज को जोड़ना होना चाहिए, न कि मतभेद बढ़ाना। कानून ऐसा हो, जिससे सभी को न्याय और समानता मिले।
घुसपैठ और निष्कासन पर सरकार को सलाह
उन्होंने कहा कि घुसपैठ का मुद्दा गंभीर है और सरकार को इस दिशा में अभी और काम करना है। पहचान कर निष्कासन की प्रक्रिया जरूरी है। पहले यह काम ठीक से नहीं हो पा रहा था, लेकिन अब इसमें धीरे-धीरे प्रगति हो रही है।
RSS का काम प्रचार नहीं, संस्कार देना
मोहन भागवत ने कहा कि RSS का उद्देश्य प्रचार करना नहीं, बल्कि समाज में संस्कार विकसित करना है। जरूरत से ज्यादा प्रचार दिखावे और अहंकार को जन्म देता है। प्रचार बारिश की तरह होना चाहिए, सही समय पर और सीमित मात्रा में।
अंग्रेजी और मातृभाषा को लेकर स्पष्ट रुख
RSS प्रमुख ने कहा कि संघ की कार्यप्रणाली में अंग्रेजी कभी मुख्य भाषा नहीं बनेगी। अंग्रेजी भारतीय भाषा नहीं है, लेकिन जरूरत पड़ने पर इसका उपयोग किया जाता है। अंग्रेजी सीखना जरूरी है, लेकिन मातृभाषा को कभी नहीं भूलना चाहिए।
दक्षिण भारत और विदेशों के उदाहरण दिए
भागवत ने बताया कि दक्षिण भारत के कुछ प्रतिनिधि हिंदी नहीं समझ पा रहे थे, इसलिए उन्होंने अंग्रेजी में संवाद किया। इसी तरह विदेशों में भारतीय प्रवासियों से बातचीत उनकी भाषा या हिंदी में की जाती है, यह देश की स्थिति पर निर्भर करता है।