MP Narmada Crisis : भोपाल। मध्यप्रदेश को कभी “नदियों का मायका” कहा जाता था, लेकिन आज यहां की नदियां गंभीर संकट से जूझ रही हैं। प्रदेश में बहने वाली 200 से ज्यादा नदियों का अस्तित्व खतरे में है। इनमें करोड़ों लोगों की आस्था और प्रदेश की संस्कृति का केंद्र बनी नर्मदा भी शामिल है।
पर्यावरणविदों के अनुसार अवैध रेत खनन, सीवेज प्रदूषण और नदियों के किनारे बढ़ता अतिक्रमण नदियों को धीरे-धीरे खत्म कर रहा है। अमेरिका के वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट ने भी नर्मदा को दुनिया की उन 6 नदियों में शामिल किया है, जिनका भविष्य खतरे में बताया गया है।
नर्मदा पर बढ़ता दबाव
जाने-माने पर्यावरणविद डॉ. सुभाष पांडे का कहना है कि मध्यप्रदेश की अधिकतर नदियां अंतिम दौर में पहुंच चुकी हैं। बारहमासी नदियों में सिर्फ नर्मदा बची है, लेकिन उस पर भी संकट गहराता जा रहा है। नर्मदा में नालों और सहायक नदियों का गंदा पानी मिल रहा है।
अवैध रेत खनन सबसे बड़ी समस्या है। रेत में ही मछलियों और अन्य जलीय जीवों की ब्रीडिंग होती है। खनन से जलीय जीवन और जैव विविधता को भारी नुकसान हो रहा है।
डॉ. पर्यावरणविद पांडे चेतावनी देते हैं कि अगर हालात नहीं बदले, तो आने वाले 50 साल में नर्मदा एक पूरी नदी नहीं रह जाएगी, बल्कि अलग-अलग जगहों पर बिखरे जल स्रोतों में सिमट जाएगी।
किन नदियों पर सबसे ज्यादा असर
अवैध खनन से नर्मदा, चंबल, शिप्रा, सोन, केन, बेतवा और तवा जैसी नदियां बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं। नर्मदा से जुड़े कई जिलों में 2024–25 के दौरान 100 से ज्यादा मामले दर्ज हुए हैं। चंबल और शिप्रा नदी क्षेत्र में भी लगातार कार्रवाई सामने आई है।
सीवेज भी बड़ी समस्या
नदियों में सीधा सीवेज मिलना एक और गंभीर चुनौती है। कांग्रेस का आरोप है कि नर्मदा को साफ करने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाए गए, लेकिन कई प्लांट पूरी क्षमता से काम नहीं कर रहे। इससे प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है।
तालाबों की हालत खराब
भोपाल का बड़ा तालाब, जो शहर की पहचान है, अब ‘सी कैटेगरी’ के पानी में आ गया है। डॉ. सुभाष पांडे के अनुसार भोपाल का कोई भी तालाब अब सीधे पीने लायक नहीं बचा है। करीब 12 लाख लोग ट्रीट किया हुआ तालाब का पानी पीने को मजबूर हैं।
सरकार का दावा
प्रदेश सरकार का कहना है कि अवैध खनन के खिलाफ लगातार कार्रवाई की जा रही है और रेत माफियाओं को बख्शा नहीं जाएगा। भाजपा नेताओं का दावा है कि नदियों और पर्यावरण संरक्षण के लिए सरकार पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
नदियां ही हमारी पहचान
विशेषज्ञों का कहना है कि मध्यप्रदेश की असली पहचान उसकी नदियां, जंगल और जल संपदा हैं। खेती, पानी, बिजली और पर्यावरण संतुलन इन्हीं पर निर्भर है।
अगर अभी सख्त और ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में इसका खामियाजा प्रदेश की जनता को भारी कीमत चुकाकर देना पड़ेगा।