Holika Dahan Rituals : आज (2 मार्च) सूर्यास्त के बाद होलिका दहन का शुभ मुहूर्त शुरू हो रहा है, जो रात करीब 12 बजे तक रहेगा। परंपरा के अनुसार प्रदोष काल यानी सूरज डूबने के समय होलिका की पूजा की जाती है और उसके बाद दहन किया जाता है। इस साल भद्रा काल भी नहीं रहेगा, इसलिए शाम 6 बजे से रात तक होलिका दहन का समय शुभ माना जा रहा है।
फाल्गुन पूर्णिमा की तिथि इस बार दो दिन (2 और 3 मार्च) पड़ रही है। वहीं 3 मार्च को चंद्रग्रहण भी है, इसलिए धुलंडी की तारीख को लेकर अलग-अलग पंचांगों में मतभेद है। कुछ जगह 3 मार्च तो कुछ जगह 4 मार्च को रंगों की होली मनाई जाएगी।
होलिका पूजन की आसान विधि
होलिका पूजन में फूल, चंदन, कच्चा सूत (मौली), नई फसल की बालियां, घर में बने सात प्रकार के पकवान, नारियल, मौसमी फल, अक्षत, रोली, हल्दी, कंडे (गोबर के उपले) और लकड़ियां आदि शामिल किए जाते हैं।
पूजा विधि इस प्रकार है:
- सबसे पहले होलिका की पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके पूजा करें।
- जल, रोली, अक्षत और फूल अर्पित करें।
- नई फसल और पकवान चढ़ाएं।
- कच्चा सूत होलिका पर लपेटें।
- घी और कपूर अर्पित कर “होलिकायै नमः” बोलते हुए परिक्रमा करें।
- तीन या सात परिक्रमा सावधानी से करें, आग के ज्यादा पास न जाएं।
धूलि वंदन से बनी धुलंडी
पुराने समय में होली की राख माथे पर लगाकर धूलि वंदन किया जाता था। मान्यता है कि त्रेतायुग में पहला यज्ञ होने पर भगवान भगवान विष्णु ने भस्म को माथे पर लगाया था। तब से राख को पवित्र माना जाता है।
ब्रज में श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ रंग और गुलाल से होली खेली थी। पहले लोग भस्म और मिट्टी से होली खेलते थे, बाद में टेसू के फूलों और गुलाल का प्रचलन बढ़ा।
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होली से जुड़ी प्रमुख मान्यताएं
1. वसंतोत्सव: ऋतु परिवर्तन का उत्सव
होली को सबसे पहले वसंतोत्सव के रूप में मनाया जाता था। फाल्गुन पूर्णिमा के आसपास सर्दी विदा होती है और वसंत का आगमन होता है। 7वीं सदी में सम्राट हर्ष के संस्कृत नाटक रत्नावली में वसंत उत्सव का वर्णन मिलता है, जहां दरबारों में संगीत, नृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे। यही परंपरा आगे चलकर लोकजीवन में आई और अबीर-गुलाल वाली होली में बदल गई।
2. दोलयात्रा: राधा-कृष्ण का झूला उत्सव
पूर्वी भारत और वैष्णव परंपरा में होली को दोलयात्रा या दोल पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। इसमें राधा-कृष्ण की प्रतिमाओं को सजाकर झूले या पालकी में निकाला जाता है और अबीर-गुलाल अर्पित किया जाता है।
कीर्तन और भक्ति कार्यक्रम होते हैं। ओडिशा और बंगाल में यह उत्सव फाल्गुन शुक्ल दशमी से दोल पूर्णिमा तक चलता है। यही दिन चैतन्य महाप्रभु की जयंती से भी जुड़ा है।
3. ब्रज की फाग: प्रेम और भक्ति की होली
ब्रज क्षेत्र- मथुरा, वृंदावन, बरसाना और नंदगांव, की होली राधा-कृष्ण की फाग-लीला से जुड़ी है। वैष्णव ग्रंथ गर्ग संहिता में होलिकोत्सव का वर्णन मिलता है, जिसमें राधा और सखियों के साथ उत्सव का जिक्र है।
यहां होली केवल रंगों का खेल नहीं, बल्कि भक्ति, फाग-गायन और लीलाओं का उत्सव है। यही परंपरा आगे चलकर गांव और शहरों की सामूहिक होली बनी।
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4. किसानों का त्योहार: नई फसल की खुशी
होली का संबंध खेती और नई फसल से भी है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अनुसार यह वसंत और फसल का उत्सव है। पहले किसान होलिका दहन में गेहूं और चने की बालियां चढ़ाते थे और पूरी बस्ती नई फसल की खुशी मनाती थी। बाद में इसमें रंग और धार्मिक परंपराएं जुड़ती चली गईं।
5. रिश्तों में मिठास घोलने वाला पर्व
विदेशी समाजशास्त्रियों, मैककिम मैरियट, डी. बी. मिलर और विक्टर टर्नर, के अनुसार भारत में होली ऐसा त्योहार है, जब लोग पुराने मनमुटाव भूलकर एक-दूसरे के करीब आते हैं। “बुरा न मानो होली है” की भावना रिश्तों में नई शुरुआत का संदेश देती है।
होलिका में अन्न और औषधियां क्यों डाली जाती हैं?
होलिका दहन को यज्ञ के समान माना गया है। इसमें नीम की लकड़ी, हल्दी, काली मिर्च, काले तिल, घी, शहद, कमलगट्टा आदि डाले जाते हैं। माना जाता है कि इनका धुआं वातावरण को शुद्ध करता है और ऋतु परिवर्तन के समय स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होता है।
धार्मिक और स्वास्थ्य दोनों दृष्टि से खास
उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के अनुसार होलिका दहन केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि मौसम परिवर्तन के समय स्वास्थ्य की दृष्टि से भी लाभकारी माना गया है। कुल मिलाकर, होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की जीत, नई फसल की खुशी और रिश्तों में प्रेम बढ़ाने का प्रतीक है। श्रद्धा और सावधानी के साथ इस पर्व को मनाना ही इसकी असली भावना है।