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Ayudh Ground Report : झाबुआ में खत्म हो जाएँगे हिंदू? अवैध धर्मांतरण के खेल पर आयुध की पड़ताल

Ayudh Ground Report

Ayudh Ground Report : मध्य प्रदेश। पुलिस केरल निवासी ईसाई पादरी, Father Godwin (गॉडविन) को गिरफ्तार करती है। उस पर आरोप था कि वो लोगों का अवैध तरीके से धर्मांतरण कर रहे थे। उसके निशाने पर खास करके आदिवासी बहुल झाबुआ जैसे इलाके होते हैं।

इस धर्मान्तरण के मामले में अदालत ने पादरी को दोषी पाया और उसे सजा हुई, ये मामला देश भर की मीडिया में छाया। यहां तक कि खुद केरल के चीफ मिनिस्टर पिनरई विजयन ने मध्य प्रदेश सरकार को लेटर लिखकर गॉडविन के साथ अच्छा व्यवहार करने की अपील की। बाद में जब गॉडविन जमानत पर बाहर आया तो उसने फिर अवैध धर्मांतरण का धन्धा शुरू कर दिया।

इसी तरह झाबुआ जिले के पडलवा ग्राम में रमेश वसुनिया नाम का व्यक्ति चर्च के अन्दर आदिवासी समाज का धर्मान्तरण कराते पकडाया था। मामला दर्ज हुआ कोर्ट ने 5 साल की सजा और डेढ़ लाख का जुर्माना भी लगाया, आरोपी जेल भी गया लेकिन पेरोल मिलने के बाद फिर से चर्च में एक्टिव हो गया।

फादर गॉडविन और रमेश वसुनिया की गिरफ्तारी महज़ एक पुलिस एक्शन नहीं था; यह उन आवाज़ों का उभरना था जो वर्षों से झाबुआ की घाटियों, बांस के जंगलों और टूटी-फूटी कच्ची बस्तियों में दबकर रह गई थीं। यह वही इलाका है जहां आदिवासी समाज सदियों से प्रकृति को देवता मानकर जीता आया है, जहां लोक देवता केवल धार्मिक प्रतीक नहीं बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी की धड़कन हैं और जहां त्योहार केवल उत्सव नहीं बल्कि पीढ़ियों की स्मृति हैं।

यह गिरफ्तारी एक ऐसे तंत्र की परतें खोलने लगी जिसने एक पूरे क्षेत्र के सांस्कृतिक ताने-बाने को बदलना शुरू कर दिया था। मीडिया के कैमरे रतलाम की ओर मुड़े, राजनीतिक बयानबाज़ी शुरू हुई, केरल के मुख्यमंत्री ने पत्र लिखकर चिंता जताई, पर झाबुआ के पहाड़ों में रहने वाले आदिवासियों के मन में केवल एक सवाल गूंजता रहा- हमारी संस्कृति, हमारे देवता और हमारी परंपरा के प्रति कौन चिंता जताएगा?

RTI के दस्तावेज में शून्य ईसाई लेकिन…

RTI के दस्तावेज बताते हैं कि 2020 तक झाबुआ जिले में किसी भी व्यक्ति का आधिकारिक धर्मांतरण दर्ज नहीं है। कागज़ों पर-शून्य ईसाई आबादी लेकिन गांवों के भीतर की सच्चाई बिल्कुल अलग है। यहां के लोग बताते हैं कि पांच-सात साल पहले तक कोई प्रार्थना-घर नहीं था, कोई रविवार की सभा नहीं होती थी, कोई बाहरी प्रचारक गांव की सीमाओं पर नहीं दिखता था।

दिवाली से ज्यादा रौशनी क्रिसमस में

आज स्थिति यह है कि कई गांवों में मिट्टी, टीन या ईंट से बने छोटे-बड़े प्रार्थना भवनों की श्रृंखला फैल गई है; रविवार को भीड़ इतनी बढ़ जाती है कि बाहर टेंट तक लगाना पड़ता है। इतना ही नहीं सबसे महत्वपूर्ण-बहुत से परिवार अपनी परंपरागत पूजा-पद्धति छोड़ चुके हैं, कई घरों में लोकदेवताओं की प्रतिमाएं हटाकर बाइबिल रख दी गई है और कई बच्चों ने अपने त्योहारों के अर्थ तक भूलने शुरू कर दिए हैं। अब दिवाली से ज्यादा रौशनी क्रिसमस में होती है।

हजारों लोग तो सिर्फ आरक्षण का लाभ लेने के लिए ईसाई धर्म अपनाने के बाद भी अपनी पहचान छुपा रहे हैं, क्योंकि कानूनन अगर किसी आदिवासी माता-पिता ने ईसाई धर्म अपना लिया है तो उनके बच्चों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा।

धर्मांतरण की प्रक्रिया के केंद्र में सबसे महत्त्वपूर्ण-विश्वास और भरोसा

गांव-गांव में जो लोग आए, वे शुरू में किसी धर्म की बात नहीं करते थे; वे अपने हाथों में दवा लेकर आते थे, बच्चों की फीस भरते थे, बुज़ुर्गों को अनाज की बोरी देते थे, कंधे पर हाथ रखकर कहते थे- हम तुम्हारे दर्द में तुम्हारे साथ खड़े हैं और यह वह बात है जो एक गरीब, बीमार, संघर्षरत आदिवासी परिवार के दिल को सीधे छू जाती है।

आयुध की पड़ताल

स्थानीय ने आयुध की ग्राउंड रिपोर्ट टीम को बताया कि- लड़का बीमार था, दवा मिली, आराम मिला-और कहा गया कि यह प्रभु का चमत्कार है। कहीं पैसा नहीं लगा, उल्टा आर्थिक मदद मिली, यही विश्वास का बीज था।

पड़ोसी ने धर्म छोड़ा, उसने कहा झूठ नहीं बोलूंगा-शांति मिलती है-और फिर हम भी चले गए। यहां तक कि कई गांवों में चर्च के बाहर फादर का मेला लगता है जहां दवा, भोजन और कपड़ों का वितरण एक बड़े धार्मिक आयोजन जैसा होता है. मेले में एक तरफ झूले और दुकानें होती हैं और एक तरफ होते हैं मेज – जिसमें बैठे अलग अलग “फादर” आदिवासियों को प्रभु का सन्देश बताते हैं और धीरे-धीरे यह ‘मदद’ एक नए विश्वास में परिवर्तित होती जाती है।

झाबुआ के कई सामाजिक कार्यकर्ता और ग्रामीण बताते हैं कि अवैध रूप से धर्मांतरित समूहों में पिछले कुछ वर्षों में एक प्रकार की उग्रता और हिंसा का रुझान देखने को मिला है। यह आरोप किसी सामान्य बहस का हिस्सा नहीं बल्कि कई घटनाओं से जोड़कर बताया जाता है-

1. पाडलवा ग्राम में रिपोर्टिंग टीम को घेरने की कोशिश

चर्च परिसर में आयुध की ग्राउंड टीम को स्थानीय लोगों ने लगभग घेर लिया था कुछ लोगों ने आक्रामक व्यवहार किया और तनाव की स्थिति बन गई। ग्रामीणों का आरोप है कि यह पहली बार नहीं है-चर्च से जुड़े समूह अक्सर बाहरी लोगों को लेकर उग्र हो जाते हैं।

2. मेघनगर में वनभूमि पर हिंसक कृत्यों का मामला

हाल ही में मेघनगर तहसील में वनभूमि पर अवैध गतिविधियों का मामला सामने आया जहां आरोप है कि बड़ी संख्या में गौ-वध किया गया और इस पूरे प्रकरण में चर्च से जुड़े लोगों की भूमिका की चर्चा हुई।

3. कन्वर्ट समूहों का ‘संगठित दबाव’

कई गांवों में सरपंच, सचिव और पंचायत के पदों तक धर्मान्तरण कर इसाई बन चुके चर्च-समर्थक लोगों की पहुंच हो गई है, और आरोप है कि वे पारंपरिक धार्मिक गतिविधियों-जैसे पिठौरा, भादो, ग्रामदेव पूजा-को हतोत्साहित करते हैं, यहां तक कि गांव के त्योहारों में भीड़ कम होने लगी है।

4. लोकदेवताओं का तिरस्कार

बहुत से परिवार बताते हैं कि धर्मांतरण के बाद उन्हें अपने ही लोकदेवताओं को गलत, पापपूर्ण और अंधविश्वास बताकर हटाने को कहा गया। कुछ लोगों ने मान लिया, कुछ ने विरोध किया-और यहीं टकराव बढ़ने लगा। मंदिर खंडहर, चर्च नए-यह दृश्य आदिवासी मन को सबसे ज्यादा चोट पहुंचाता है

सदियों पुराने माताजी के मंदिर, पिठौरा के स्थल, गांव के देवताओं के छोटे-छोटे घर-सब टूटे-फूटे, जर्जर और उपेक्षित खड़े हैं।

उधर दूसरी ओर- सरकारी जमीनों पर ईंट-सीमेंट से बने आधुनिक, बड़े और शक्तिशाली चर्च तेजी से खड़े किए जा रहे हैं।
कई जगह मरियम के मंदिर को लोकदेवताओं जैसा दिखाने के लिए “मरी माता” (मरियम माता) नाम देकर स्थापित किया गया है, ताकि मंदिर और चर्च के बीच की रेखा धीरे-धीरे मिट जाए और बदलाव सहज लगे।

यह दृश्य आदिवासी मन के लिए किसी सांस्कृतिक हमले जैसा महसूस होता है-क्योंकि मंदिर उनका विश्वास नहीं बल्कि उनका इतिहास हैं, और चर्च इस इतिहास के ठीक सामने खड़ा होकर एक नए विश्वास की घोषणा करता है।

सामाजिक कार्यकर्ता आज़ाद प्रेमसिंह, जो वर्षों से झाबुआ की जमीनी हकीकत का दस्तावेजीकरण कर रहे हैं, बताते हैं- कई क्षेत्रों में 40–50% आबादी धर्मान्तरित है। 70% गांवों में हर रविवार धार्मिक सभाएं होती हैं, जिनमें अवैध धर्मांतरण की प्रक्रिया चलती है।

कन्वर्ट होने वालों की जनजातीय आरक्षण की पात्रता खत्म करने की जांच शुरू हुई थी लेकिन बीच में रोक दी गई। सरकारी जमीनों पर चर्च निर्माण की शिकायतें बहुत बढ़ी हैं। धर्म बदलने के बाद व्यक्ति की मान्यताएं, परंपराएं और सांस्कृतिक स्मृतियां खत्म होती जाती हैं-वह समुदाय का हिस्सा नहीं रहता, बल्कि एक अलग पहचान का वाहक बन जाता है।

उनके अनुसार यह सबसे खतरनाक बात है- व्यक्ति के मन में अपने ही समाज के प्रति नफरत का भाव भरना।

आदिवासी प्रथा, लोकदेवता और त्योहार: वे जड़ें जिन्हें मिटाने की कोशिश की जा रही है

झाबुआ का समाज दुनिया के उन कुछ समुदायों में से है जहां प्रकृति पूजा आज भी अपनी मूल अवस्था में जीवित है। शादी-विवाह में तडवी और बड़वा मंत्र पढ़ते हैं, रातभर गीत गाए जाते हैं, पूर्वजों को याद किया जाता है, घरों में पिठौरा बनाया जाता है, और ग्रामदेवता से गांव की रक्षा व समृद्धि की कामना की जाती है।

ये सब केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं हैं; ये हवा, जंगल, नदी और पूर्वजों से जुड़ी एक पूरी सभ्यता का अस्तित्व हैं। जब कोई इन त्योहारों को गलत, अंधविश्वास या शैतानी परंपरा बताने लगता है, तो यह केवल पूजा नहीं, बल्कि एक संस्कृति की जड़ पर आघात है।

कई बुजुर्ग आज यही कह रहे हैं- हमारे बाद अगर बच्चे हमारे देवताओं को ही गलत समझने लगें, तो हम किस पहचान के साथ जिएंगे?

घर वापसी-अपनी जड़ों की तलाश में लौटते परिवार

मेघजी अमल्यार का परिवार इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। चर्च ने कुआं बनवाया, पड़ोसी के लिए घर भी बनवाया; बच्चों को 200 रुपये महीना दिया जाता था; लेकिन धीरे-धीरे उन्हें एहसास हुआ कि यह मदद दरअसल पहचान खरीदने की कीमत है।

अम्ल्यार जी बताते हैं कि रामायण देखने के बाद परिवार को लगा कि वह अपनी जड़ों से कट चुका है। उन्होंने कहा- इस देश में जो है सब हमारा ही है… चर्च हमें क्या नई दुनिया देगा? हमारी संस्कृति ही हमारी असली दौलत है और 2002 में पूरा परिवार वापस हिन्दू धर्म में लौटा।

रतलाम में हुई गिरफ्तारी ने एक बहस को जन्म दिया है- यह मुद्दा सिर्फ़ कानून, राजनीति या धार्मिक बहस का नहीं है। यह मुद्दा एक पूरे समाज की आत्मा का है।

आदिवासी समाज कह रहा है- हम किसी के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन हमारी आने वाली पीढ़ियां अगर हमारे त्योहार, हमारे लोकदेवता, हमारे मंत्र, हमारी पिठौरा कला, हमारी पहचान भूल जाएं, तो फिर हम बचेंगे किस रूप में?

यह सवाल सिर्फ झाबुआ का नहीं है; यह सवाल उस हर समुदाय का है जिसकी संस्कृति पैसे, दवा, मदद, और व्यवस्था की कमजोरियों के सहारे धीरे-धीरे बदली जा रही है।

ईसाई बनने के बाद भी ले रहे आरक्षण का लाभ

धर्मांतरण का यह खुला खेल न केवल सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से इस क्षेत्र में बदलाव ला रहा है बल्कि ईसाइयों के इस कारनामे के कारण कई जरूरतमंद जनजाति नागरिकों को उनके अधिकार का आरक्षण भी नहीं मिल पा रहा है। क्योंकि आज भी पेटलवाद तहसील कार्यालय में कई ऐसे व्यक्ति कार्य कर रहे हैं, जिन्होंने अपना धर्म परिवर्तन कर लिया है।

फिर भी आज दिनांक तक वे अनुसूचित जनजाति को मिलने वाले आरक्षण का लाभ लेकर काम कर रहे हैं। इन उदाहरण के बाद डीलिस्टिंग की वह मांग और जायज हो गई है जो कि जनजाति समाज काफी लंबे समय से उठा रहा है। यदि डीलिस्टिंग हो जाती है तो जो व्यक्ति ईसाई बन गए हैं उनको अनुसूचित जनजाति के आरक्षण का लाभ नहीं मिल पायेगा।

मजबूत कदम उठाने की जरूरत

मध्यप्रदेश जैसे राज्य जहाँ धर्मांतरण की गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिए धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम जैसा कठोर कानून बना हुआ है वहां चर्च और मिशनरियों के द्वारा कराया जा रहा धर्मांतरण केंद्र और राज्य सरकार के लिए एक खतरे की घंटी के समान है। यदि अभी सरकारें नहीं जागीं और इन मिशनरियों पर कठोर कार्रवाई न की गई तो एमपी के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों से जनजाति समाज आबादी खत्म हो जाएगी।

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