Bombay High Court Decision : मुंबई। भारत में लंबे समय से बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों के लिए कड़े कानून और सख्त सजा की मांग उठती रही है। खासकर नाबालिगों के साथ दुष्कर्म के मामलों में कानून बेहद कठोर है, जिसमें न्यूनतम 20 साल के कठोर कारावास से लेकर आजीवन कारावास या मृत्युदंड तक का प्रावधान है। इसी बीच बॉम्बे हाई कोर्ट के एक हालिया फैसले ने कानूनी और सामाजिक बहस को तेज कर दिया है।
ये है पूरा मामला
दरअसल, बॉम्बे हाई कोर्ट ने वर्ष 2016 में पांच साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म के मामले में दोषी ठहराए गए युवक की उम्रकैद की सजा को घटाकर 12 साल कर दिया है। 2 फरवरी को पारित आदेश में जस्टिस सारंग कोतवाल और जस्टिस संदेश पाटिल की पीठ ने दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए सजा में आंशिक कमी की। यह फैसला आरोपी की ओर से दायर अपील पर सुनाया गया।
इन विशेष परिस्थितियों को बनाया आधार
अदालत ने सजा में कमी के पीछे कुछ विशेष परिस्थितियों को आधार बनाया। कोर्ट ने कहा कि अपराध के समय आरोपी की उम्र 20 वर्ष थी और उसका कोई पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था।
वह दिसंबर 2016 से लगातार जेल में बंद है और कोविड-19 महामारी के दौरान भी उसे अंतरिम रिहाई नहीं मिली। इन तथ्यों को सजा निर्धारण के दौरान महत्वपूर्ण माना गया।
सुधार की संभावनाओं को नहीं कर सकते नजरअंदाज
हाई कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि जेल में रहते हुए आरोपी ने सुधारात्मक गतिविधियों में भाग लिया। रिकॉर्ड में प्रस्तुत प्रमाणपत्रों के अनुसार उसने शैक्षणिक कार्यक्रमों में हिस्सा लिया, जिनमें महात्मा गांधी पर निबंध प्रतियोगिता और उनके विचारों से जुड़े अध्ययन कार्यक्रम शामिल थे।
अदालत ने कहा कि सुधार की संभावनाओं को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हालांकि पीठ ने स्पष्ट किया कि अपराध अत्यंत गंभीर है, लेकिन दंड निर्धारण में सुधार की संभावना भी एक महत्वपूर्ण पहलू है।
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अदालत के अनुसार 12 वर्ष का कारावास न्याय के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए पर्याप्त होगा। साथ ही यह भी कहा गया कि आरोपी द्वारा अब तक जेल में बिताई गई अवधि को संशोधित सजा में समायोजित किया जाएगा।
पांच साल की बच्ची के साथ किया था यौन अपराध
अभियोजन पक्ष के अनुसार, 9 दिसंबर 2016 को पांच वर्षीय बच्ची पानी भरने के लिए पड़ोसी के घर गई थी, जहां आरोपी ने उसके साथ यौन अपराध किया।
बच्ची ने भयभीत अवस्था में अपनी मां को घटना की जानकारी दी, जिसके बाद परिवार ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। ट्रायल के दौरान आठ वर्ष की आयु में पीड़िता ने अदालत में गवाही दी।
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि नाबालिग की गवाही विश्वसनीय और स्पष्ट थी। अदालत ने पाया कि बच्ची ने घटना का वर्णन बिना किसी सिखावन या दबाव के किया, जिससे उसकी गवाही पर भरोसा किया गया। इसी आधार पर दोषसिद्धि को बरकरार रखा गया, जबकि सजा में आंशिक राहत दी गई।