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कैसे आया प्रधानमंत्री को सेंगोल देने का विचार,क्यों दिया जाता है सेंगोल…

28 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नई  संसद भवन का उद्घाटन करने वाले हैं जिसको लेकर विपक्ष की 19 पार्टियाँ नाराज़ है और अब दंड को लेकर भी सियासत शुरू हो गयी है  अमित शाह ने बताया की उद्घाटन के दिन ही तमिलनाडु से आए एक महान विद्वान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राजदंड देंगे . यह दंड आजादी के समय 14 अगस्त 1947 रात 12 बजे तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को दिया गया था .

क्या है सेंगोल से जुडी 1947 की कहानी

1947 में जब भारत अंग्रेजों की गुलामी से आजाद होने वाला था तब आज़ादी के कुछ ही दिन पहले आखिरी वायसराय माउंटबेटन ने जवाहरलाल नेहरू से पूछा की आप देश की आज़ादी को किसी ख़ास प्रतीक के जरिये मनाना चाहते हैं तो बताइये . नेहरू उस वक्त प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी सी. राजगोपालाचारी के पास गए और उनको बताया ,राजगोपालाचारी को संस्कृति का और परम्पराओं का अच्छा ज्ञान था ,उसने जवाहरलाल नेहरू को तमिलनाडु की दंड प्रथा के बारे में बताया ,तब नेहरू ने भी हाँ कह दी ,उन्होंने ये भी बताया की यह दंड सिर्फ तमिलनाडु के  थिरुवदुथुरै अधीनम मठ के गुरु के हाथों दिया जाता है तब तुरंत पंडित नेहरू ने राजगोपालाचारी को दंड तैयार करवाने को कह दिया .

तब राजगोपालाचारी ने थिरुवदुथुरै अधीनम मठ से संपर्क किया तो पता चला की वहाँ के 20 वे राजगुरु श्री ला श्री अम्बाला देसिका स्वामीगल बीमार है .पता चलते ही राजगुरु ने उनकी बात स्वीकार कर ली और एक सुनार को सोने की परत वाला चाँदी का दंड बनाने को कह दिया ,इसके बाद उन्होंने उसपर नंदी की आकृति बनाने को भी कहा .

तबियत ख़राब होने के बाबजूद भी राजगुरु ने अपनी ज़िम्मेदारी निभाई और अपने प्रतिनिधि  श्री ला श्री कुमारस्वामी थम्बिरन  को भेजा , पंडित नेहरू ने इनको लेने के लिए एक विशेष विमान की व्यवस्था की .

ऐसे दिया गया था नेहरू को सेंगोल

थिरुवदुथुरै अधीनम मठ के राजगुरु ने अपने प्रतिनिधि  श्री ला श्री कुमारस्वामी थम्बिरन  को भेजा ,इनने 14 अगस्त 1947 को रात 11 बजकर 45 मिनट पर राजदंड लार्ड माउंटबेटन के हाथ में दे दिया ,और बैटन से दंड वापस . दंड पर पवित्र जल छिड़का और फिर शैव सम्प्रदाय के महान संत थिरुगनाना सांथल

के लिखे भजन गाये और पंडित नेहरू को पीताम्बर कपड़ा उड़ा दिया .माथे पर भस्म का तिलक लगाया और राज दंड उनके हाथों में सौंप दिया .बाद में यह दंड पंडित नेहरू ने संग्रहालय में रखवा दिया ताकी आम जनता भी आजादी के समय हुए सत्ता हस्तांतरण के प्रतीक इस राजदंड को देख पाएं .

कैसे आया सेंगोल देने का विचार

1947 की घटना के बाद सेंगोल को इलाहाबाद के संग्रहालय में रख दिया गया था . एक बार 1978 में कांची मठ के महान ज्ञाता ने ये घटना अपने शिष्य को बताई जिसके बाद शिष्य ने उसे छपवा दिया था . इस घटना को तमिलनाडु में हमेशा याद रखा गया और आज़ादी के अमृत महोत्सव के दौरान लोगों के सामने बताया गया तब प्रधानमंत्री को भी इसमें रूचि आयी उन्होंने तभी इसके जाँच के आदेश देदीये .  

घटना की पुष्टि के बाद ये निर्णय लिया गया की इस दंड को अब नई संसद में लोकसभा अध्यक्ष के स्थान के बगल में रखा जाएगा .28 मई को यह दंड पूरे रीति रिवाजों के साथ तमिलनाडु के  थिरुवदुथुरै अधीनम मठ के गुरु द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दिया जायेगा .

क्या है दंड का पुराना इतिहास

सेंगोल एक राजदंड है जो समृद्धि का प्रतीक है ,ये जिसे भी दिया जाता है उससे निष्पक्ष और न्यायपूर्ण शासन की उम्मीद की जाती है . सन 1661 में जब दूसरे चार्ल्स  के राज्याभिषेक के लिए तब इंग्लैंड की रानी का ‘सॉवरेन्स ओर्ब’ बनवाया गया था ,जिस पर क्रॉस का निशान था जो राजा को ये याद दिलाता था की उसकी सारी शक्तियां भगवान की दी हुई हैं .  

ये दंड सोने की धातु से बना होता है .362 साल बाद आज भी यह प्रथा वहाँ चलती आ रही है ,आज भी जब कोई नई रानी या नया राजा राज्य की गद्दी पर बैठता है तो उसे ये दंड दिया जाता है.

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