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रायसेन जौहर : 700 क्षत्राणियों के शौर्य की गाथा है रायसेन किले की ये घटना !

भारत के गौरवशाली इतिहास में दर्जनों ऐसे उदाहरण हैं जिन्हें पढ़ और सुनकर आज भी हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं . इन उदाहरणों में जब भारतीय वीरांगनाओं की बात आती है तो याद आते हैं उनके शौर्य पूर्ण निर्णय ऐसे ही एक निर्णय का उदाहरण है. रायसेन के किले में किया गया रानी दुर्गावती का जौहर . यह जौहर मध्य प्रदेश की राजधानी के समीप रायसेन जिले के किले पर रानी दुर्गावती के साथ 700 वीरांगनाओं ने किया था .


 
ये है जौहर  की पूरी कहानी .

इतिहासकारों के अनुसार आज से लगभग 991 वर्ष पहले 6 मई 1532 को यह जोहर रायसेन के किले में उस वक्त किया गया था जब रायसेन के किले पर राजा शिलादित्य की रानी दुर्गावती ने बहादुर शाह के सामने झुकने की बजाए लड़ने की बात ठानी थी.
रानी दुर्गावती मेवाड़ के महाराजा राणा सांगा की बेटी थी उनका विवाह रायसेन के तोमर राजा शिलादित्य से हुआ था . विवाह के बाद से ही रानी दुर्गावती अपने पति के साथ राज्य की प्रजा की सेवा में जुटी रहती थी और राजा शिलादित्य के हर निर्णय में कंधे से कंधा मिलाकर उनका साथ देती थी.
लेकिन 6 मई को रानी दुर्गावती ने अपने राज्य को देख  दुश्मनों के सामने झुकने की बजाए 700 वीरांगनाओं के साथ जौहर कर लिया.
दरअसल गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह नजर हमेशा से ही रायसेन के किले पर थी जिसके बाद उसने रायसेन के किले पर हमला करने के योजना बनाई और प्रदेश के मांडू में पड़ाव डाला. जिसके बाद राजा शिलादित्य को अपने कैंप में बुलाकर धोखे से मांडू में ही कैद कर लिया और अपनी सेना के साथ राजा शिलादित्य के भाई लक्ष्मण राय की देखरेख में जब यह अकेला था तब इसके लिए को घेर लिया . घेराबंदी के बाद भी जब सुल्तान रायसेन के किले में सेंध नहीं मार पाया . लेकिन इस इस दौरान बहादुर शाह किले को जीतने की जद्दोजहद में लगा रहा शत्रुओं की सेना की संख्या अधिक होने के कारण राजा शिलादित्य की हार तय थी लेकिन फिर भी राजा ने किले में पहुंचकर रानी दुर्गावती और अपने भाई से कहा कि किसी भी हालत में हमें झुकना नहीं है हर हाल में लड़ना है रानी दुर्गावती ने अपने सैनिकों से कहा था कि “झुको मत लड़ो” .

 रानी ने लिया एक समय भोजन करने का निर्णय

बहादुर शाह के साथ जब रायसेन किले की सेना का युद्ध शुरू हुआ तो युद्ध में बारूद की कमी और सैनिकों की कमी के साथ-साथ धीरे-धीरे अनाज की भी कमी महसूस होने लगी उस वक्त रानी दुर्गावती ने फैसला लिया कि वह एक समय ही भोजन करेंगे देखते देखते रायसेन की  सारी महिलाएं एक समय भोजन करने लगीं .
ऐसे में राजपूत सेना ने बहादुर शाह की सेना से लड़ाई जारी रख आत्मघाती युद्ध शुरू तो कर लिया लेकिन इस युद्ध में राजा शिलादित्य और उनके भाई की मृत्यु हो गई जिसके बाद रानी दुर्गावती ने 700 राजपूतनियों के साथ रायसेन के किले में बनी एक कुंड में जाकर जोहर कर लिया.
इस घटना की जानकारी जैसे ही शिलादित्य के बेटे भूपति राय को  लगी तो वह अपने युद्ध अभियान से वापस लौटा और बहादुर शाह के सामंत को मार भगाया जिसके बाद एक बार फिर रायसेन के किले पर राजपूत राजाओं का कब्जा हो गया .

जिले के गजेटियर में मौजूद हैं ऐतिहासिक प्रमाण

इस ऐतिहासिक घटना से अधिकांश लोग अनभिज्ञ हैं लेकिन आज भी इस गौरवशाली घटना का उल्लेख रायसेन जिले के गजट ईयर में मौजूद है वरिष्ठ पुरातत्वविद नारायण व्यास जी के अनुसार रायसेन के किले में रानी दुर्गावती के जोहर के कई ऐतिहासिक प्रमाण मिले हैं उनके मुताबिक इतिहास को अगर देखा जाए तो मध्यकाल में रायसेन के किले की महत्वपूर्ण भूमिका रही है

संदर्भ – वरिष्ठ पत्रकार अम्बुज माहेश्वरी द्वारा प्रकाशित न्यूज रिपोर्ट और रायसेन जिले का गजेटियर

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