राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से भोपाल में आयोजित प्रमुख जन गोष्ठी को सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने संबोधित किया। उन्होंने कहा कि मत, पंथ, भाषा और जाति अलग हो सकती है, लेकिन हिन्दू पहचान हम सबको जोड़ती है। हमारी संस्कृति, धर्म और पूर्वज एक हैं। कार्यक्रम में मध्यभारत प्रांत के संघचालक श्री अशोक पांडेय और भोपाल विभाग के संघचालक श्री सोमकान्त उमालकर भी उपस्थित रहे।
हिन्दू होना स्वभाव और प्रकृति
डॉ. भागवत ने कहा कि हिन्दू केवल धार्मिक पहचान नहीं, बल्कि स्वभाव और जीवन पद्धति है। धर्म का अर्थ पूजा-पद्धति या रिलीजन नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर चलना, कर्तव्य निभाना और समाज में सद्भाव बनाए रखना है। रास्ते अलग हो सकते हैं, लेकिन लक्ष्य एक ही है।
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संघ को तुलना से नहीं समझा जा सकता
सरसंघचालक ने कहा कि संघ को किसी अन्य संगठन से तुलना करके नहीं समझा जा सकता। संघ न तो पैरा मिलिट्री फोर्स है और न ही केवल समाजसेवी संगठन। संघ एक अनूठी पद्धति है, जो व्यक्ति और समाज निर्माण का कार्य करती है। शताब्दी वर्ष में समाज तक संघ की सही जानकारी पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है।
किसी प्रतिक्रिया में नहीं बना संघ
उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ किसी विरोध या प्रतिस्पर्धा में शुरू नहीं हुआ। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने देश की परिस्थितियों पर गहन चिंतन के बाद समाज में एकता और गुणवत्ता लाने के लिए संघ की स्थापना की। उद्देश्य था समाज को ‘स्व’ का बोध कराना, ताकि स्वतंत्रता स्थायी बनी रहे।
उपेक्षा और विरोध के बावजूद आगे बढ़ा संघ
डॉ. भागवत ने कहा कि संघ ने भारी विरोध और उपेक्षा के बावजूद अपना कार्य जारी रखा। स्वयंसेवकों ने त्याग और समर्पण से संघ को यहां तक पहुंचाया, जहां आज समाज का विश्वास प्राप्त हुआ है।
पंच परिवर्तन का आह्वान
अंत में उन्होंने समाज के प्रमुख जनों से सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्व-बोध और नागरिक अनुशासन जैसे पंच परिवर्तन पर मिलकर काम करने का आह्वान किया।
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