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मध्य प्रदेश का पहला आदिवासी मुख्यमंत्री जिसने महज़ 13 दिन में दिया इस्तीफा…

13 दिनों के प्रधानमंत्री को तो आप जानते ही होंगे पर क्या आप जानते हैं मध्य प्रदेश में एक मुख्यमंत्री की सरकार भी 13 दिन तक रही यही नहीं इस मुख्यमंत्री से एक और ऐतिहासिक तथ्य जुड़ता है कि ये प्रदेश का पहला आदिवासी मुख्यमंत्री था .ये नाम है सारंगढ़ रियासत के आखिरी राजा नरेश चन्द्र का .

MP में विद्युत के जनक कहे जाने वाले नरेश सिर्फ 13 दिन के लिए मुख्यमंत्री बन पाए थे. लेकिन क्या कारण था जिस वजह से महज 13 दिन में राजा नरेश चन्द्र को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा ..

सारंगढ़ रियासत के आखिरी राजा

राजा नरेश चन्द्र का जन्म तत्कालीन मध्य प्रदेश की सारंगढ़ रियासत में हुआ था ,ये रियासत के आखिरी राजा थे . 1948 में सारंगढ़ रियासत का मध्यप्रदेश में विलय हुआ था .राजा नरेश तत्कालीन मध्यप्रदेश की पुसोर विधानसभा के 15 बार विधायक बने , यह 17 बार मंत्री बने और 13 दिन के लिए मुख्यमंत्री बने जिसके बाद इनने राजनीति से संन्यास ले लिया .

तत्कालीन कांग्रेस नेताओं ने रचा ये षड्यंत्र

जब सारंगढ़ रियासत का विलय मध्यप्रदेश में हुआ तब राजा नरेश और उनके परिवार ने कांग्रेस से नाता बना लिया . साल 1967 में राजमाता सिंधिया ने तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारका प्रसाद से अनबन के चलते कांग्रेस छोड़ दी और जनसंघ से जुड़ गयी .सिंधिया की ही तरह पार्टी के कई नेताओं को द्वारिका प्रसाद से परेशानी. इनमे से एक है गोविन्द नारायण सिंह .

 गोविन्द एक बार राजमाता से मुलाकात करने आते हैं और कहते हैं कि अब वो कांग्रेस में नहीं रहना चाहते तब गोविन्द सिंह अपने साथ 35 और विधायकों को अपने साथ जनसंघ में ले आये.उस समय द्वारिका प्रसाद मिश्र की सरकार अस्थिर हो गयी और राजमाता सिंधिया ने मौका देखकर संयुक्त विधायक दल का गठन कर लिया और संयुक्त सरकार बना ली .

जब प्रदेश के मुख्यमंत्री की बात आई तो लोगों ने राजमाता का ही नाम लिया पर राजमाता ने गोविन्द नारायण  सिंह को मुख्यमंत्री बनाया .गोविन्द की सरकार भी सिर्फ 19 महीने ही चल पाई जिसके बाद 10 मार्च 1969 को गोविन्द नारायण ने इस्तीफा दे दिया . इस्तीफा देने के पीछे कई कारण बताये जाते है जिनमे मुख्य है सिंह की नेताओं से अनबन .

राजमाता ने रखी थी शर्त

जब गोविन्द नारायण सिंह ने इस्तीफा दिया तब राजा नरेश चन्द्र राजमाता के पास जाकर कांग्रेस पार्टी छोड़ने और राजमाता के साथ होने की बात करते है तो राजमाता एक शर्त रखती हैं, वो कहती है कि उनको को गोविन्द की तरह ही अपने साथ और कार्यकर्ताओं को लाना होगा .

नरेश किसी कार्यकर्ता को अपने साथ नहीं ला पाए पर वो कांग्रेस छोड़ चुके थे इसलिए उन्हें 13 मार्च 1969 को मुख्यमंत्री बनाया गया लेकिन सिर्फ 13 दिन ही प्रदेश की बागडोर संभाल पाए . दरअसल जब राजा नरेश चन्द्र मुख्यमंत्री बने तब गोविन्द नारायण सिंह का दोबारा कांग्रेस के प्रति प्रेम जाग गया और उन्होंने दोबारा उन 35 कार्यकर्ताओं के साथ कांग्रेस में वापसी कर ली.

इसके बाद प्रदेश के पहले गोंड जनजाति के मुख्यमंत्री राजा नरेश चन्द्र को इस्तीफा देना पड़ा .इस्तीफा देने के बाद राजा नरेश ने राजनीति से संन्यास ले लिया . बताया जाता है कि आज भी उनकी बेटियां चुनाव लड़ा करती है .  

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