ये हैं मध्य प्रदेश के राष्ट्रीय उद्यानों की लिस्ट …
मध्य प्रदेश भारत का ऐसा राज्य है जहां प्रकृति और जानवरों का सबसे अधिक समन्वय बैठता है । प्रदेश प्रकृति प्रेमियों के लिए स्वर्ग जैसा है क्योंकि यहाँ कुल 12 राष्ट्रीय उद्यान हैं और आज हम आपको इन सभी उद्यानों की जानकारी देंगे …गढ़ राष्ट्रीय उद्यान | बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान मध्य प्रदेश के उमरिया जिले में स्थित भारत के सबसे प्रसिद्ध राष्ट्रीय उद्यानों में से एक है। यह राष्ट्रीय उद्यान 437 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है और अपनी समृद्ध जैव विविधता, घने जंगलों और आश्चर्यजनक परिदृश्य के लिए प्रसिद्ध है। बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान 1968 में स्थापित किया गया था तथा 1993 में इस राष्ट्रीय उद्यान को बाघ परियोजना के तहत टाइगर रिजर्व घोषित किया गया।बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान में विभिन्न प्रकार के वन्यजीव प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिसमें Royal Bengal Tiger, तेंदुआ, भालू, भारतीय गौर, सांभर हिरण शामिल हैं। यह नेशनल पार्क विशेष रूप से बाघों की संख्या के लिए प्रसिद्ध है तथा प्रयटक यहाँ बाघों को देखने के लिए आते हैं। पेंच राष्ट्रीय उद्यान पेंच राष्ट्रीय उद्यान मध्य प्रदेश के सिवनी और छिंदवाड़ा जिलों में स्थित है, और महाराष्ट्र में भी फैला हुआ है। यह राष्ट्रीय उद्यान 758 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है और यह वनस्पतियों और जीवों की विविध श्रेणी के लिए प्रसिद्ध है।पेंच राष्ट्रीय उद्यान 1975 में स्थापित किया गया तथा पेंच नदी के नाम पर इस राष्ट्रीय उद्यान का नाम रखा गया है। पेंच राष्ट्रीय उद्यान अपनी समृद्ध जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध है तथा यहाँ कई लुप्तप्राय और दुर्लभ प्रजातियाँ पाई जाती हैं। संजय राष्ट्रीय उद्यान संजय राष्ट्रीय उद्यान मध्य प्रदेश के सीधी जिले में स्थित एक राष्ट्रीय उद्यान है। यह नेशनल पार्क 466 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है तथाअपनी समृद्ध जैव विविधता और सुंदर परिदृश्य के लिए जाना जाता है। संजय राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना 1981 में हुई थी।संजय राष्ट्रीय उद्यान में बाघ, तेंदुए, भारतीय बाइसन, चित्तीदार हिरण और जंगली सूअर सहित वनस्पतियां और जीव पाए जाते हैं। संजय नेशनल पार्क का नाम संजय पहाड़ियों के नाम पर रखा गया है, जो विंध्य रेंज का एक हिस्सा हैं और पार्क से होकर गुजरती हैं। यह नेशनल पार्क अपने ऊबड़-खाबड़ इलाके और घने जंगलों के लिए जाना जाता है, जो विभिन्न प्रकार के वन्यजीवों के लिए एक प्राकृतिक आवास प्रदान करते हैं। सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान मध्य प्रदेश का एक लोकप्रिय राष्ट्रीय उद्यान है। यह राज्य के होशंगाबाद जिले में स्थित है। यह राष्ट्रीय उद्यान 524 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है तथा यहाँ विभिन्न वनस्पतियाँ और जीव पाए जाते हैं। सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना 1981 में हुई थी।यह राष्ट्रीय उद्यान अपनी अनूठी स्थलाकृति के लिए जाना जाता है, जिसमें गहरी घाटियाँ, ऊँची पहाड़ियाँ और कई धाराएँ और झरने शामिल हैं। यहाँ कई दुर्लभ और लुप्तप्राय प्रजाति भी पाई जाती हैं जैसे भारतीय विशाल गिलहरी, भालू, भारतीय तेंदुआ और बंगाल टाइगर शामिल हैं। कान्हा राष्ट्रीय उद्यान कान्हा राष्ट्रीय उद्यान भारत के सबसे बड़े और सबसे प्रसिद्ध राष्ट्रीय उद्यानों में से एक है। यह मध्य प्रदेश के मंडला और बालाघाट जिलों में स्थित है। कान्हा नेशनल पार्क 940 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है और अपने विविध वनस्पतियों और जीवों के लिए प्रसिद्ध है, जिसमें कई लुप्तप्राय प्रजातियां शामिल हैं।कान्हा राष्ट्रीय उद्यान को 1933 में वन्यजीव अभयारण्य तथा 1955 राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया था। इस राष्ट्रीय उद्यान को 1974 में बाघ परियोजना (Project Tiger) के तहत टाइगर रिज़र्व घोषित किया गया। बंगाल टाइगर के अलावा, कान्हा नेशनल पार्क कई अन्य उल्लेखनीय प्रजातियों का भी घर है, जिनमें भारतीय तेंदुआ, बारासिंघा (एक प्रकार का हिरण), जंगली कुत्ता, भारतीय गौर और सांभर हिरण शामिल हैं। माधव राष्ट्रीय उद्यान माधव राष्ट्रीय उद्यान मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में स्थित है। यह नेशनल पार्क 375 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है और अपनी समृद्ध जैव विविधता और सुंदर परिदृश्य के लिए जाना जाता है।इस राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना 1959 में हुई थी तथा यहाँ बाघ, तेंदुआ, चीतल, सांभर और भारतीय बाइसन सहित वनस्पतियों और जीवों की कई प्रजातियां पाई जाती हैं।माधव राष्ट्रीय उद्यान का नाम माधव सागर झील के नाम पर रखा गया है, जो इस राष्ट्रीय उद्यान के भीतर स्थित है और क्षेत्र के वनस्पतियों और जीवों के लिए पानी का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। यह नेशनल पार्क अपने कई ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्मारकों के लिए भी जाना जाता है, जिनमें माधव विलास पैलेस और जॉर्ज कैसल शामिल हैं। वन विहार राष्ट्रीय उद्यान वन विहार राष्ट्रीय उद्यान मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के मध्य में स्थित है। यह राष्ट्रीय उद्यान 4.45 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है और अपनी समृद्ध जैव विविधता और शांत परिवेश के लिए जाना जाता है।इस नेशनल पार्क की स्थापना 1979 में की गयी थी तथा यह राष्ट्रीय उद्यान बाघों, शेरों, तेंदुओं, चीतल, सांभर और विभिन्न प्रकार के पक्षियों सहित वनस्पतियों और जीवों की कई प्रजातियों का घर है। यह राष्ट्रीय उद्यान एक शहर के भीतर स्थित पूरी तरह से संरक्षित वन क्षेत्र है, जो इसे पर्यटकों और स्थानीय लोगों दोनों के लिए एक लोकप्रिय जगह बनाता है। पन्ना राष्ट्रीय उद्यान पन्ना राष्ट्रीय उद्यान मध्य प्रदेश के पन्ना और छतरपुर जिलों में स्थित भारत का एक राष्ट्रीय उद्यान है। यह राष्ट्रीय उद्यान 542.67 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है तथा यह अपनी समृद्ध जैव विविधता और सुंदर परिदृश्य के लिए जाना जाता है।पन्ना नेशनल पार्क को 1981 में स्थापित किया गया था तथा यहाँ बाघों, तेंदुओं, चीतल, सांभर और सुस्त भालुओं सहित वनस्पतियों और जीवों की विभिन्न प्रजाति पाई जाती हैं।पन्ना राष्ट्रीय उद्यान अपने संरक्षण प्रयासों और पहलों के लिए जाना जाता है, जिसका उद्देश्य पार्क के प्राकृतिक संसाधनों और वन्य जीवन की रक्षा करना है। भारत सरकार द्वारा वर्ष 1994 में पन्ना राष्टीय उद्यान को बाघ परियोजना के तहत एक टाइगर रिज़र्व ( Tiger Reserve ) घोषित किया गया था फॉसिल (जीवाश्म) राष्ट्रीय उद्यान फॉसिल (जीवाश्म) राष्ट्रीय उद्यान को घुघुआ जीवाश्म उद्यान के नाम से भी जाना जाता है। यह मध्य प्रदेश के डिंडोरी जिले में स्थित एक राष्ट्रीय उद्यान है। यह नेशनल पार्क में 0.27 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है और यह अपने अद्वितीय भूवैज्ञानिक
ये है मध्य प्रदेश की स्थापना करने के पीछे का इतिहास..
आजादी के बाद 1 नवम्बर को मध्य प्रदेश की स्थापना हुई ,जिसे प्रदेश की जनता स्थापना दिवस के रूप मे मनाती है । लेकिन प्रश्न ये उठता है कि आखिर किस कारण से राज्यों के पुनर्गठन मे मध्य प्रदेश कि स्थापना हुई ,किस आधार पर इसे राज्य बनाया गया और क्या है प्रदेश कि स्थापना से जुड़ा इतिहास । आइए जानते हैं.. ऐसे हुई मध्य प्रदेश की स्थापना 26 जनवरी, 1950 को संविधान लागू हुआ इसके बाद सन् 1951-1952 में देश में पहले आम चुनाव कराए गए। जिसके कारण संसद एवं विधान मण्डल कार्यशील हुए। प्रशासन की दृष्टि से इन्हें श्रेणियों में विभाजित किया गया। सन् 1956 में राज्यों के पुर्नगठन के फलस्वरूप 1 नवंबर, 1956 को नए राज्य के रूप में मध्य प्रदेश का निर्माण हुआ। इस प्रदेश का पुर्नगठन भाषीय आधार पर किया गया था। इसके घटक राज्य मध्य प्रदेश, मध्य भारत, विन्ध्य प्रदेश एवं भोपाल थे जिनकी अपनी विधानसभाएं थीं। इस राज्य का निर्माण तत्कालीन सीपी एंड बरार, मध्य भारत, विंध्यप्रदेश और भोपाल राज्य को मिलाकर हुआ। इसे पहले मध्य भारत के नाम से भी जाना जाता था। भोपाल बना राजधानी1 नवंबर, 1956 को प्रदेश के गठन के साथ ही इसकी राजधानी औऱ विधानसभा का चयन भी कर लिया गया। भोपाल को मध्य प्रदेश की राजधानी के रूप में चुन लिया गया। राजधानी बनने के बाद 1972 में भोपाल को जिला घोषित कर दिया गया। मध्य प्रदेश के गठन के समय कुल जिलों की संख्या 43 थी। आज मध्य प्रदेश में कुल 52 जिले हैं। इन शहरों मे से चुनी थी राजधानी राजधानी के लिए राज्य के कई बड़े शहरों में आपसी लड़ाई चल रही थी, सबसे पहला नाम ग्वालियर फिर इंदौर का गूँज रहा था इसके साथ ही राज्य पुनर्गठन आयोग ने राजधानी के लिए जबलपुर का नाम भी सुझाया था लेकिन भोपाल में भवन ज्यादा थे, जो सरकारी कामकाज के लिए उपयुक्त थे। इसी वजह से भोपाल को मध्य प्रदेश की राजधानी के तौर पर चुना गया था। भोपाल के नवाब तो भारत से संबंध ही रखना नहीं चाहते थे, वह हैदराबाद के निजाम के साथ मिलकर भारत का विरोध करने लगे थे। देश के हृदय स्थल में राष्ट्र विरोधी गतिविधियों को रोकने के लिए भोपाल को ही मध्य प्रदेश की राजधानी बनाने का निर्णय लिया गया।
ये हैं मध्य प्रदेश के 10 सबसे प्रसिद्ध मंदिर …
मध्य प्रदेश पौराणिक समय से ही आस्था का केंद्र रहा है । प्रदेश की भूमि पर ऐसे कई चामत्कारिक मंदिर है जो अपने दिव्य अनुभव ,पौराणिक कथा और मंदिर की बनावट के कारण काफी प्रसिद्ध है । आज हम आपको मध्यप्रदेश के ऐसे ही 10 प्रसिद्ध मंदिरों के बारे मे बताएंगे ,जहाँ जाकर आप भी दिव्य अनुभव कर सकते है साथ ही वहाँ होने वाले चमत्कारों को भी देख सकते हैं । 1 चौसठ योगिनी मंदिर – माँ नर्मदा की गोद में बसे मध्य प्रदेश की संस्कारधानी जबलपुर में कई ऐसे मंदिर हैं जिनके इतिहास की गणना करना बहुत कठिन है। इनमें से कई मंदिर दूर-दराज के इलाकों में स्थित हैं। ऐसा ही एक मंदिर नर्मदा से थोड़ी दूर पर लगभग 70 फुट ऊँची पहाड़ी पर स्थित है। विश्व प्रसिद्ध भेड़ाघाट के नजदीक स्थित चौसठ योगिनी मंदिर सभवतः भारत का इकलौता मंदिर है, जहाँ भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह की प्रतिमा स्थापित है। कहा जाता है कि इस मंदिर के लिए नर्मदा ने भी अपनी दिशा बदल दी थी। हालाँकि देश के कई अन्य मंदिरों की तरह यह भी औरंगजेब के इस्लामिक कट्टरपंथ की भेंट चढ़ा, लेकिन वह मंदिर के गर्भगृह में स्थापित प्रतिमा का कोई नुकसान नहीं कर पाया। 2.ओंकारेश्वर मंदिर – भगवान शिव से जुड़े द्वादश ज्योतिर्लिंगों में मध्य प्रदेश स्थित ओंकारेश्वर का चौथा स्थान आता है. यहां पर भगवान शिव नर्मदा नदी के किनारे ॐ के आकार वाली पहाड़ पर विराजमान हैं. हिंदू धर्म में ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिग को लेकर कई मान्यताएं हैं. जिसमें सबसे बड़ी मान्यता ये है कि भगवान भोलेनाथ तीनों लोक का भ्रमण करके प्रतिदिन इसी मंदिर में रात को सोने के लिए आते हैं. महादेव के इस चमत्कारी और रहस्यमयी ज्योतिर्लिंग को लेकर यह भी मानना है कि इस पावन तीर्थ पर जल चढ़ाए बगैर व्यक्ति की सारी तीर्थ यात्राएं अधूरी मानी जाती है. 3.वैजनाथ मंदिर – ये मंदिर आगर मालवा के सुसनेर रोड (उज्जैन-कोटा रोड राष्ट्रिय राजमार्ग 27) पर स्थित है. मंदिर बाणगंगा नदी के तट पर बना हुआ है और उसका निर्माण कार्य 1528 में शुरु और 1536 में पूर्ण हुआ. अंग्रेज़ दंपत्ति ने 1883 में मंदिर का पुनर्निमाण करवाया. ये बेहद आश्चर्यजनक बात है कि एक अंग्रेज़ दंपत्ति ने आख़िर एक मंदिर को क्यों बनवाया, जबकि वे ईसाई धर्म का पालन करते हैं. 4.पीताम्बर मंदिर – मध्यप्रदेश के दतिया जिले में स्थित मां पीतांबरा सिद्धपीठ है। इसकी स्था.पना 1935 में की गई थी। यहां मां के दर्शन के लिए कोई दरबार नहीं सजाया जाता बल्कि एक छोटी सी खिड़की है, जिससे मां के दर्शन का सौभाग्य मिलता है। यूं तो हर समय ही यहां भक्तोंी का मेला सा लगा रहता है लेकिन नवरात्र में मां की पूजा का विशेष फल प्राप्तय होता है। कहा जाता है कि पीले वस्त्र धारण करके, मां को पीले वस्त्रश और पीला भोग अर्पण करने से भक्तज की हर मुराद यहां पूरी होती है। 5. महाकालेश्वर मंदिर –भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में भक्तों को दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग के दर्शन होते हैं। महाकालेश्वर मंदिर मुख्य रूप से तीन हिस्सों में विभाजित है। इसके ऊपरी हिस्से में नाग चंद्रेश्वर मंदिर है, नीचे ओंकारेश्वर मंदिर और सबसे नीचे जाकर आपको महाकाल मुख्य ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजित नजर आते हैं। जहां आपको भगवान शिव के साथ ही गणेशजी, कार्तिकेय और माता पार्वती की मूर्तियों के भी दर्शन होते हैं। इसके साथ ही यहां एक कुंड भी है जिसमें स्नान करने से सभी पाप धुल जाते हैं। 6. ओरछा रामराजा मंदिर – ओरछा के इस मंदिर को लेकर कई कहानियां प्रचलित है. इनमें से एक कहानी ये है कि एक बार भगवान राम ने ओरछा के राजा मधुकरशाह को सपना में दर्शन दिए थे. जिसके बाद वो राजा भगवान श्रीराम के आदेश पर अयोध्या से उनकी प्रतिमा लाए थे. वहीं राजा ने मूर्ति को मंदिर में स्थापित करने से पहले एक जगह पर रखा था और जब प्राण-प्रतिष्ठा के वक्त मूर्ति को वहां से हटाया जाने लगा तो वो ऐसा नहीं कर पाए, तभी राजा को गवान का निर्देश याद आया कि वो जिस स्थान पर विराजमान हो जाएंगे वहां से हटाए नहीं जाएंगे. यही वजह है कि रामलला सरकार महल में विराजे हैं ये देश का एकमात्र मंदिर है जहां भगवान राम राजा के रूप में पूजे जाते हैं. इसके अलावा एमपी पुलिस सुबह और शाम यहां पर बंदूकों से सलामी देती है. यही वजह है कि इस मंदिर में दूर-दूर से भक्त भगवान राम का सम्मान देखने भक्त आते हैं। 7. सास बहु मंदिर – ग्वालियर स्थित सास-बहू मंदिर, दो मंदिरों का एक समूह, एक वास्तुशिल्प रत्न है और मान मंदिर पैलेस के दक्षिण में स्थित है। मूल रूप से शाहस्त्र बाहु मंदिर के रूप में जाना जाने वाला यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है, जिसे 11वीं शताब्दी की शुरुआत में कछवाहा राजा महिपाल ने बनवाया था। यह संभवतः किला परिसर का सबसे प्राचीन मंदिर है। सहस्त्रबाहु मंदिर या सास बहू मंदिर, , जो मूर्तिकला स्तंभों और नक्काशीदार पायलटों की भूलभुलैया की प्रचुरता के लिए उल्लेखनीय है जो बहन संरचनाओं के बड़े हिस्से को सजाते हैं। सास बहू मंदिर के बड़े हिस्से पर एक लंबा संस्कृत शिलालेख है, जिसमें कहा गया है कि इसे 1098 ईस्वी में ग्वालियर के एक राजपूत राजकुमार द्वारा पूरा किया गया था। इन मंदिरों को भारत के खूबसूरत स्मारकों में शुमार किया जाता है। यह एक वास्तुशिल्प चमत्कार है, जिसके स्तंभों को मूर्तियों और दीवार की आकृतियों से सजाया गया है। 8. मतंगेश्वर मंदिर – खजराहु का मतंगेश्वर महादेव मंदिर के पुजारी बाबू लाल गौतम बताते हैं कि यहां शिवलिंग 9 फीट जमीन के अंदर और उतना ही बाहर भी है. मान्यता है कि मंदिर में मौजूद इस शिवलिंग की हर साल शरद पूर्णिमा के दिन एक इंच लंबाई बढ़ती है. प्रति वर्ष कार्तिक माह की शरद पूर्णिमा के दिन शिवलिंग की लंबाई एक तिल के आकार के बराबर बढ़ती है. शिवलिंग की लंबाई नापने के लिए पर्यटन विभाग के कर्मचारी बकायदा मेजरमेंट टेप का उपयोग करते हैं. चमत्कारिक रूप से शिवलिंग पहले की तुलना में लंबा मिलता है. 9. भरत मिलाप मंदिर -भरत मिलाप मंदिर कामदगिरि परिक्रमा मार्ग पर स्थित है।